शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

इतिहास के रुप में फंतासी

इतिहास के रुप में फंतासी
जिन बदलाव की भगवां वकालत कर रहा है , उसे समझने के लिए उन नौं पाठयपुस्तकों- जिनमें से आठ के लेखक स्वयं बत्रा ही हैं- पर सरसरी निगाह डालना काफी होगा, जो कि गुजरात के 42,000  प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में वितरित की गई हैं और जिन्हें पढ़ाना अनिवार्य है। इनमें से एक , तेजोमय भारत , गुजरात राज्य स्कूल पाठयपुस्तक निगम ( जी एस टी बी  )    द्वारा प्रकाशित की गई है, ‘जो बच्चों को इतिहास , विज्ञान, भूगोल,धर्म व अन्य बुनियादी बातों के बारे में तथ्यों को सिखाती है।’ पुस्तक के उद्धरणों से इस बात पर  पर्याप्त  प्रकाश  पड़ता है कि भारतीय शिक्षा को बत्रा जी किस दिशा  में ले जाना चाहते हैं।
स्टेम सेल पर  शोध के लिए अमरीका चाहता है कि उसे श्रेय मिले , लेकिन सच्चाई यह है कि भारत के डा. बालकृष्ण  गनपत मातपुरकर ने पहले ही शरीर के हिस्सों के पुर्नउत्पादन के लिए पेटैंट प्राप्त कर लिया था ...तुम्हें जानकर आश्चर्य  होगा कि यह कोई नया शोध  नहीं है और मातपुरकर को महाभारत से प्रेरणा मिली थी। कुंती ने स्वयं सूर्य जैसे तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया था। जब गान्धारी को, जो दो वर्षों  तक गर्भवती नहीं हो पाई थी, इस बात का पता चला तो उसका गर्भपात हो गया। उसके गर्भ से मांस का एक टुकड़ा बाहर निकला था। (ऋषि )  द्वैपायन व्यास को बुलाया गया । कड़े मांस के इस टुकड़े का उन्होंने निरीक्षण किया और फिर उन्होंने इसे कुछ विशेष  दवाईयों के साथ एक ठंडे टैंक में रखा। फिर उन्होंने मांस के इस टुकड़े के 100 भाग किये और उन्हें घी से भरी 100 अलग अलग टंकियों में दो साल तक रखा। दो साल के बाद , इन टंकियों से 100 कौरव पैदा हुए। इसको पढ़कर मातुरकर ने महसूस किया किया कि स्टेम सेल उनकी खोज नहीं है। हजारों साल पहले भारत में इसकी खोज हो चुकी थी। पेज 92.93

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