शिक्षा का साम्प्रदायीकरण
हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की अपनी रणनीति को पूरा करने के लिए आरएसएस और भाजपा समूचे समाज का साम्प्रदायीकरण करना चाहती है और इसके लिए वे शिक्षा को वैचारिक प्रभुत्व कायम करने के लिए हथियार के रुप में उपयोग कर रही है। अपने बल पर बहुमत के साथ सत्ता में आने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद , एक बार फिर युवाओं के मस्तिष्क को प्रदूशित करने का काम शुरु हो गसा है। शिक्षा के जरिए भावी पीढ़ियों को भ्रष्ट करने का काम एक ऐसी कला है, जिसे हिटलर ने अपने मुहावरे में व्यक्त किया था- "युवाओं पर काबू पाओं।"आर्य श्रेष्ठता और नस्लीय घृणा के अपने ऐजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए नाजियों ने सम्पूर्ण शैक्षिक पाठयक्रम में बदलाव किये थे। युवा मस्तिष्क को साम्पगदायिक जहर से दूषित करने के लिए प्रेरणा आरएसएस-भाजपा को हिटलर की इसी विचारधारा और मुहावरे से मिलती है।
भाजपा नेताओं ने घोषित तौर पर पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम में बदलाव लाने के अपने इरादों की घोषणा की है ।पूर्व भाजपा अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री एम वैंकैया नायडू ने पिछले वर्ष 23 जून , 2013 को दृढ़ता पूर्वक यह ब्यान दिया था कि "यदि भाजपा सत्ता आती है ,तो वह पाठ्यपुस्तकों तथा पाठ्यक्रमों में बदलाव करेगी । " वे इसके लिए क्षमा प्रार्थी नहीं हैं कि जब वे पहली बार सत्ता में आये थे , उन्होंने तब भी ऐसा प्रयास किया था : " हमने पहले भी इसका इसका प्रयास किया था और आगे भी ऐसा करेंगे । " अब वे अपने दम पर बहुमत के साथ लोक सभा में सत्ता में वापस आये हैं और गठबंधन की राजनीति के खींचतान से मुक्त हैं , इसलिए वे चाहते हैं कि इस बार यह बदलाव सुनिश्चित हो ।
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह , जो कुछ समय पहले तक भाजपा के अध्यक्ष भी थे , ने 23 जुलाई 2014 को राज्य सभा में इस और इशारा भी किया है । देश में बढ़ रहे अपराधों पर बोलते हुए राज्य सभा में उन्होंने कहा : " जनता के दृष्टिकोण में बदलाव लाने के लिए मूल्यों को उनके दिमाग में बैठाने की जरूरत है " और कि " जीवन मूल्यों और मानवीय मूल्यों के प्रति बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूली पाठ्य पुस्तकोँ में बदलाव प्रस्तावित किये गए हैं । "
मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने भी ब्यान दिया है कि देश की शिक्षा नीति में सुधार करने के लिए राज्य वार और क्षेत्र वार राष्ट्रीय बहस शुरू करने की पहल कदमी की जाएगी । हैदराबाद में " भारतीय मूल्य -दृष्टिकोण के साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन " नामक संगोष्ठी में बोलते हुए उन्होंने कहा : " 1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति सूत्रबद्ध की गयी थी । 2014 में नयी आशा आकाँक्षाओं और सम्भावनाओं वाले भारत के लिए , नयी शिक्षा नीति की जरूरत है , जो एक मजबूत , अटूट तथा मानवीय उदीयमान राष्ट्र का निर्माण कर सके ।
आरएस एस भाजपा को निर्देशित करती है । ये सभी व्यक्ति आर एस एस से ही पैदा हुए हैं और उसके प्रति अपने कर्तव्य को निबाह रहे हैं । भाजपा की चुनावी सफलता से उत्साहित होकर अब आर एस एस और उससे संबद्ध संगठन अपने "लोगों" को शासन स्तर पर हुए "राजनैतिक परिवर्तन " को "सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन " में रूपांतरण को सुनिश्चित करने के काम में लगा रहे हैं । यही कारण है कि वे समूची शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन के लिए पहल कदमी कर रहे हैं और इसके लिए वे मानव संसाधन विकास मंत्री से 6 बार मिल भी चुके हैं और अपने मंसूबों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाने के लिए निर्देशित कर चुके हैं ।
आर एस एस से संबद्ध शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (एस एस यू एन ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा , जिन्होंने भाजपा के पहले शासनकाल के दौरान शिक्षा का सांप्रदायीकरण करने के मामले में बहुत बदनाम भूमिका अदा की थी , असंदिग्ध ढंग से कहा है : " राजनैतिक परिवर्तन हो चुके हैं , अब शिक्षा में पूर्ण बदलाव होना चाहिए "
हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की अपनी रणनीति को पूरा करने के लिए आरएसएस और भाजपा समूचे समाज का साम्प्रदायीकरण करना चाहती है और इसके लिए वे शिक्षा को वैचारिक प्रभुत्व कायम करने के लिए हथियार के रुप में उपयोग कर रही है। अपने बल पर बहुमत के साथ सत्ता में आने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद , एक बार फिर युवाओं के मस्तिष्क को प्रदूशित करने का काम शुरु हो गसा है। शिक्षा के जरिए भावी पीढ़ियों को भ्रष्ट करने का काम एक ऐसी कला है, जिसे हिटलर ने अपने मुहावरे में व्यक्त किया था- "युवाओं पर काबू पाओं।"आर्य श्रेष्ठता और नस्लीय घृणा के अपने ऐजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए नाजियों ने सम्पूर्ण शैक्षिक पाठयक्रम में बदलाव किये थे। युवा मस्तिष्क को साम्पगदायिक जहर से दूषित करने के लिए प्रेरणा आरएसएस-भाजपा को हिटलर की इसी विचारधारा और मुहावरे से मिलती है।
भाजपा नेताओं ने घोषित तौर पर पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम में बदलाव लाने के अपने इरादों की घोषणा की है ।पूर्व भाजपा अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री एम वैंकैया नायडू ने पिछले वर्ष 23 जून , 2013 को दृढ़ता पूर्वक यह ब्यान दिया था कि "यदि भाजपा सत्ता आती है ,तो वह पाठ्यपुस्तकों तथा पाठ्यक्रमों में बदलाव करेगी । " वे इसके लिए क्षमा प्रार्थी नहीं हैं कि जब वे पहली बार सत्ता में आये थे , उन्होंने तब भी ऐसा प्रयास किया था : " हमने पहले भी इसका इसका प्रयास किया था और आगे भी ऐसा करेंगे । " अब वे अपने दम पर बहुमत के साथ लोक सभा में सत्ता में वापस आये हैं और गठबंधन की राजनीति के खींचतान से मुक्त हैं , इसलिए वे चाहते हैं कि इस बार यह बदलाव सुनिश्चित हो ।
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह , जो कुछ समय पहले तक भाजपा के अध्यक्ष भी थे , ने 23 जुलाई 2014 को राज्य सभा में इस और इशारा भी किया है । देश में बढ़ रहे अपराधों पर बोलते हुए राज्य सभा में उन्होंने कहा : " जनता के दृष्टिकोण में बदलाव लाने के लिए मूल्यों को उनके दिमाग में बैठाने की जरूरत है " और कि " जीवन मूल्यों और मानवीय मूल्यों के प्रति बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूली पाठ्य पुस्तकोँ में बदलाव प्रस्तावित किये गए हैं । "
मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने भी ब्यान दिया है कि देश की शिक्षा नीति में सुधार करने के लिए राज्य वार और क्षेत्र वार राष्ट्रीय बहस शुरू करने की पहल कदमी की जाएगी । हैदराबाद में " भारतीय मूल्य -दृष्टिकोण के साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन " नामक संगोष्ठी में बोलते हुए उन्होंने कहा : " 1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति सूत्रबद्ध की गयी थी । 2014 में नयी आशा आकाँक्षाओं और सम्भावनाओं वाले भारत के लिए , नयी शिक्षा नीति की जरूरत है , जो एक मजबूत , अटूट तथा मानवीय उदीयमान राष्ट्र का निर्माण कर सके ।
आरएस एस भाजपा को निर्देशित करती है । ये सभी व्यक्ति आर एस एस से ही पैदा हुए हैं और उसके प्रति अपने कर्तव्य को निबाह रहे हैं । भाजपा की चुनावी सफलता से उत्साहित होकर अब आर एस एस और उससे संबद्ध संगठन अपने "लोगों" को शासन स्तर पर हुए "राजनैतिक परिवर्तन " को "सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन " में रूपांतरण को सुनिश्चित करने के काम में लगा रहे हैं । यही कारण है कि वे समूची शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन के लिए पहल कदमी कर रहे हैं और इसके लिए वे मानव संसाधन विकास मंत्री से 6 बार मिल भी चुके हैं और अपने मंसूबों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाने के लिए निर्देशित कर चुके हैं ।
आर एस एस से संबद्ध शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (एस एस यू एन ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा , जिन्होंने भाजपा के पहले शासनकाल के दौरान शिक्षा का सांप्रदायीकरण करने के मामले में बहुत बदनाम भूमिका अदा की थी , असंदिग्ध ढंग से कहा है : " राजनैतिक परिवर्तन हो चुके हैं , अब शिक्षा में पूर्ण बदलाव होना चाहिए "
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