शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

इतिहास के रुप में फंतासी

इतिहास के रुप में फंतासी
जिन बदलाव की भगवां वकालत कर रहा है , उसे समझने के लिए उन नौं पाठयपुस्तकों- जिनमें से आठ के लेखक स्वयं बत्रा ही हैं- पर सरसरी निगाह डालना काफी होगा, जो कि गुजरात के 42,000  प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में वितरित की गई हैं और जिन्हें पढ़ाना अनिवार्य है। इनमें से एक , तेजोमय भारत , गुजरात राज्य स्कूल पाठयपुस्तक निगम ( जी एस टी बी  )    द्वारा प्रकाशित की गई है, ‘जो बच्चों को इतिहास , विज्ञान, भूगोल,धर्म व अन्य बुनियादी बातों के बारे में तथ्यों को सिखाती है।’ पुस्तक के उद्धरणों से इस बात पर  पर्याप्त  प्रकाश  पड़ता है कि भारतीय शिक्षा को बत्रा जी किस दिशा  में ले जाना चाहते हैं।
स्टेम सेल पर  शोध के लिए अमरीका चाहता है कि उसे श्रेय मिले , लेकिन सच्चाई यह है कि भारत के डा. बालकृष्ण  गनपत मातपुरकर ने पहले ही शरीर के हिस्सों के पुर्नउत्पादन के लिए पेटैंट प्राप्त कर लिया था ...तुम्हें जानकर आश्चर्य  होगा कि यह कोई नया शोध  नहीं है और मातपुरकर को महाभारत से प्रेरणा मिली थी। कुंती ने स्वयं सूर्य जैसे तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया था। जब गान्धारी को, जो दो वर्षों  तक गर्भवती नहीं हो पाई थी, इस बात का पता चला तो उसका गर्भपात हो गया। उसके गर्भ से मांस का एक टुकड़ा बाहर निकला था। (ऋषि )  द्वैपायन व्यास को बुलाया गया । कड़े मांस के इस टुकड़े का उन्होंने निरीक्षण किया और फिर उन्होंने इसे कुछ विशेष  दवाईयों के साथ एक ठंडे टैंक में रखा। फिर उन्होंने मांस के इस टुकड़े के 100 भाग किये और उन्हें घी से भरी 100 अलग अलग टंकियों में दो साल तक रखा। दो साल के बाद , इन टंकियों से 100 कौरव पैदा हुए। इसको पढ़कर मातुरकर ने महसूस किया किया कि स्टेम सेल उनकी खोज नहीं है। हजारों साल पहले भारत में इसकी खोज हो चुकी थी। पेज 92.93

सोमवार, 12 जनवरी 2015

सांप्रदायिक घटनाओं में कमी:सांप्रदायिक मानसिकता में वृद्धि

Posted: 09 Jan 2015 04:11 AM PST
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा देश के उन इलाकों में भी फैल गई, जहां उसका कोई इतिहास नहीं था। हापुड़ और लोमी ;उत्तरप्रदेश जैसे छोटे शहरों व हरियाणा के गुड़गांव को सांप्रदायिक हिंसा ने अपनी चपेट में ले लिया। सहारानपुर और हैदराबाद में मुसलमानों और सिक्खों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं।
सन् 2014 की लक्षित हिंसा की सबसे भयावह घटना 23 दिसंबर को हुई जब असम के कोकराझार और सोनीपुर जिलों में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड ;एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े के उग्रवादियों ने महिलाओं और बच्चों सहित, 76 आदिवासियों की जान ले ली। लगभग 7,000 ग्रामीणों को अपने घरबार छोड़कर भागना पड़ा। आदिवासियों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में तीन बोडो मारे गये।
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की 561 घटनाएं हुईं, जबकि सन् 2013 में ऐसी घटनाओं की संख्या 823 थी। सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में 90 लोग मारे गये और 1,688 घायल हुए। सन् 2013 में ये आंकड़े क्रमश: 133 व 2,269 थे। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने 'धार्मिक कारकों, लैंगिक विवादों,मोबाइल एप्स अथवा सोशल मीडिया में धर्म या धार्मिक प्रतीकों के कथित अपमान, धार्मिक स्थलों की जमीन को लेकर विवाद और अन्य मुद्दों' को सांप्रदायिक हिंसा भड़कने का कारण बताया।
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में ;असम की नस्लीय हिंसा को शामिल करके  201 व उसे छोड़कर 90 लोग मारे गये। इसकी तुलना में, आतंकी हमलों में 18 लोगों की मृत्यु हुई और 19 घायल हुए। मारे जाने वालों में 3 पुलिसकर्मी और 4 अतिवादी थे। जम्मू.कश्मीर में हुए आतंकी हमलों में 27 लोग मारे गये। इनमें शामिल थे 15 सुरक्षाकर्मी, 4 नागरिक और 8 अतिवादी। इन हमलो में 5 लोग घायल हुए, जिनमें से एक सरपंच और चार सीमा सुरक्षा बल कर्मी थे। इसके बावजूद, गुवाहाटी में 29 नवंबर 2014 को राज्यों के पुलिस महानिरीक्षकों और महानिदेशकों की 49वीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद, देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है और सरकार यह सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध है कि दुनिया के किसी भी आतंकी संगठन को भारत में अपने पैर जमाने की इजाजत न दी जाए। उन्होंने यह संदेह व्यक्त किया कि देश के कुछ पथभ्रष्ट युवा आईसिस जैसे आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित हो सकते हैं परंतु सरकार उन्हें रोकने का हर संभव प्रयास करेगी। सांप्रदायिक हिंसा में मारे गये लोगों की  संख्या,आतंकवादी हमलों की तुलना में 14 गुना थी। परंतु गृहमंत्री के उद्घाटन भाषण में सांप्रदायिक हिंसा का जिक्र तक नहीं था।
अगर हम असम को छोड़ दें,जहां एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े द्वारा मई में बंगाली मुसलमानों और दिसंबर में आदिवासियों पर किए गए हमलों में कुल 111 लोग मारे गये,तो 2014 में सभी राज्यों में उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की सर्वाधिक घटनाएं हुईं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार,सन् 2014 में उत्तरप्रदेश में हुईं 129 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में 25 लोग मारे गये और 364 घायल हुए। इस मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर रहा जहां 82 घटनाओं में 12 लोगों की जानें गईं और 165 घायल हुए। इसी राज्य में,2013 में 88 सांप्रदायिक दंगों में 12 लोग मारे गये थे और 352 घायल हुए थे। तीसरे नंबर पर रहा कर्नाटक जहां 68 घटनाओं में 6 लोगों की मृत्यु हुई और 151 घायल हुए। सन् 2013 में कर्नाटक में 73 घटनाओं में 11 लोग मारे गये थे और 235 घायल हुए थे। गुजरे साल में राजस्थान में सांप्रदायिक हिंसा की 61 घटनाएं हुईं,जिनमें 13 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं और 116 घायल हुए। गुजरात में 59 घटनाओं में 8 लोगों की जानें गईं और 172 घायल हुए। सन् 2013 में गुजरात में 68 हिंसक सांप्रदायिक झड़पों में 10 लोगों की मृत्यु हुई थी और 184 घायल हुए थे। सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के लिहाज से बिहार पांचवे स्थान पर रहाए जहां 51 घटनाओं में 4 लोग मारे गये और 267 घायल हुए। सन् 2013 में बिहार में हुई 63 घटनाओं में 7 लोग मारे गये थे और 283 घायल हुए थे।
हमारे देश में एक सांगठनिक 'दंगा निर्माण प्रणाली'  विकसित हो गई है जो राजनैतिक परिस्थितियों के अनुकूल होने पर, जब चाहे, जहां चाहे दंगें भड़काने में सक्षम है। यह सांगठनिक ढांचा दिन.प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से इसके हौसले और बुलंद हुए हैं। यदि सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं और उनमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या, सन् 2013 की तुलना में कम रही तो इसका कारण यह था कि इस वर्ष दंगों या लक्षित हिंसा से कोई विशेष राजनैतिक लाभ मिलने की उम्मीद नहीं थी। 
छत्तीसगढ़ के बस्तर में ईसाईयों का सामाजिक बहिष्कार हो रहा है और उनके संगठनों को आरएसएस के निर्देशों के अनुरूप काम करना पड़ रहा है। बस्तर के ईसाई इतने आतंकित हैं कि उनके संगठनों ने एक तथ्यान्वेषण दल ;जिसका गठन धार्मिक स्वातन्त्र्य के संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन के मामलों का अध्ययन करने के लिए किया गया थाद्ध से उसकी बस्तर यात्रा रद्द करने को कहा क्योंकि उन्हें डर था इससे उनके खिलाफ हिंसा में और तेजी आयेगी। ऐसा लगता है कि सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी और अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रहने के लिए मजबूर किया जाना.ये दोनों ही हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की सोची.समझी रणनीति का अंग है।
अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की इस कोशिश की प्रतिक्रिया में एमआईएम के तेवर और अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं और उसके नेता जहर उगल रहे हैं। इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को दो तरह से लाभ हो रहा है। एक तो जनता और मीडिया का ध्यान उनकी हरकतों से हट रहा है और दूसरेए उन्हें अपनी कार्यवाहियों और कथनों को उचित ठहराने का मौका मिल रहा है। ष्आपष् के नेताओं ने तो भाजपा पर यह आरोप तक लगाया है कि उसने ही दिल्ली के चुनाव में एमआईएम के उम्मीदवारों को प्रायोजित किया है क्योंकि चुनाव मैदान में एमआईएम की मौजूदगी के कारण धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा और अंततः इससे भाजपा लाभान्वित होगी।
सन् 2014 में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक घटनाएं उत्तरी और पष्चिमी भारत में हुईंए यद्यपि घटनाओं और मरने व घायल होने वालों की संख्या में सन् 2013 की तुलना में कमी आई। ऐसा प्रतीत होता है कि सांप्रदायिकता भड़काकर दंगे करवाने का मुख्य लक्ष्य चुनाव में लाभ पाना होता है। दक्षिण भारत में केवल कर्नाटक में सांप्रदायिक हिंसा हुई। मध्यप्रदेश में सन् 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा की 84 घटनाओं की तुलना में सन् 2014 में केवल 42 घटनायें हुईं व इस कारण यह राज्य सांप्रदायिक हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित पांच राज्यों की सूची से हट गया। सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी का कारण यह था कि सन् 2013 में राज्य में विधानसभा चुनाव थे और इसलिए सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। कई अध्ययनों से यह साफ हो गया है कि अन्य पार्टियों की तुलना मेंए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से सबसे अधिक लाभ भाजपा को मिलता है। यही कारण है कि चुनाव के कुछ महिने पहले से सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि होने लगती है। सन् 2013 में अकेले उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में सांप्रदायिक दंगों में 77 लोग मारे गये थे। भाजपा और उसके सहयोगियों ने 2014 की शुरूआत में हुए लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में 80 में से 74 लोकसभा सीटों पर विजय हासिल की और भाजपा ने मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी अपने नेताओं का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया।
यद्यपि सन् 2014 में पिछले वर्ष की तुलना में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं कम हुईं और इनमें मारे जाने और घायल होने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई परंतु समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने और सांप्रदायिक घृणा फैलाने के प्रयास अनवरत जारी रहे। भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने खुलेआम यह कहा कि वे ऐसे अंतर्राधार्मिक विवाह नहीं होने देंगे जिनमें लड़का मुसलमान और लड़की हिंदू हो। उन्होंने बिना किसी आधार के यह आरोप लगाया कि एक षड़यंत्र के तहतए हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाकर उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है। इस षडंयत्र को उन्होंने लवजिहाद का नाम दिया। हिंदू राष्ट्रवादियों ने देश के उत्तरी व पश्चिमी इलाकों में इस तरह के विवाहों के खिलाफ कटु अभियान चलाया और घर.घर इसका विरोध करते हुए पर्चे व पुस्तिकाएं बांटी। इसके बाद राजस्थान में चुनाव सभाओं को संबोधित करते हुए भाजपा सरकार में मंत्री मेनका गांधी ने बिना कोई प्रमाण प्रस्तुत किए यह आरोप लगाया कि गौवध से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करने के लिए किया जा रहा है। अगर मेनका गांधी के पास इस आशय के कोई पुख्ता सुबूत हैं तो उन्हें ये सुबूत पुलिस को सौंपने चाहिये ताकि उनकी जांच की जा सके। परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। एक अन्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक घिनौने भाषण में कहा कि भारतीयों के दो वर्ग हैं.रामजादे और हरामजादे.अर्थात् सभी गैर.हिंदू अवैध संताने हैं।
विहिप ने आगरा में गरीब मुसलमानों,जो कि कचड़ा बीनकर अपना जीवनयापन करते हैं, को हिंदू बनाने का अभियान चलाया। इसके लिए धमकी और लोभ दोनों का इस्तेमाल किया गया। धमकी यह दी गई कि अगर वे हिंदू न बने तो उनकी झुग्गियों को उखाड़ फेंका जायेगा और लालच यह दिया गया कि अगर वे अपना धर्म बदलने को तैयार हो जायेंगे तो उन्हें राशन व बीपीएल कार्ड आदि उपलब्ध करवाये जायेंगे। इसके बाद यह धमकी भी दी गई कि आगरा में क्रिसमस के आसपास बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू बनाया जायेगा और प्रवीण तोगडि़या ने यह फरमाया कि भारत में हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत 82 से बढ़ाकर 100 किया जायेगा। एक अन्य भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने यह आधारहीन और तथ्यों के विपरीत आरोप लगाया कि सभी मदरसे आतंकी प्रशिक्षण के अड्डे हैं। तथ्य यह है कि कई मदरसों में हिंदू बच्चे भी पढ़ते हैं। साक्षी महाराज ने ही गोडसे को देशभक्त बताया और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह कहा कि वे चाहती हैं कि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाए।
भाजपा नेताओं व हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा घृणा फैलाने के प्रयासों के ये चंद उदाहरण भर हैं। भाजपा नेताओं ने यह बयान भी दिया कि वे हर मस्जिद से लाउडस्पीकर उतार लेंगे। इस तरह के भड़काऊ और आधारहीन वक्तव्यों में से केवल कुछ ही राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पाते हैं और उनसे कुछ ज्यादा को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में जगह मिलती है। परंतु ऐसे अनेक वक्तव्य और भाषण न तो राष्ट्रीय और ना ही क्षेत्रीय मीडिया में प्रकाशित होते हैं। आम चुनाव में भाजपा की जीत के बादए अलग.अलग बैनरों के तहत काम कर रहे हिंदू राष्ट्रवादियों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। वे यह मानने लगे हैं कि उनकी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा, देश के कानून से ऊपर है और वे जो चाहे कर सकते हैं। वे खुलकर विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच घृणा और शत्रुता को बढ़ावा दे रहे हैं और उनके मुख्य निशाने पर हैं अल्पसंख्यक समुदाय।
कई मामलों में इस तरह के अभियानों से धन भी कमाया जा रहा है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब मवेशियों को ले जा रहे ऐसे ट्रकों, जिनका या तो ड्रायवर अथवा मालिक मुसलमान था, को रोक लिया गया और मवेशियों को हिंदुत्व कार्यकर्ता इस बहाने अपने घर ले गए कि इन ट्रकों में गायों को काटने के लिए ले जाया जा रहा था। ऐसे ट्रकों को तभी आगे जाने दिया जाता है जब या तो ड्रायवर अथवा मालिक बड़ी रकम चुकाने को तैयार हो। इसी तरह, बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों को घुसपैठिया बताया जा रहा है और ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में क्रिसमस व नये साल पर होने वाले कार्यक्रमों में हुडदंग मचाने की घटनाएं हो रही हैं। यह आरोप लगाया जाता है कि ईसाई स्कूल, हिंदू विद्यार्थियों का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। इस तरह के आधारहीन आरोपों को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में भारी प्रचार मिलता है और इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,अल्पसंख्यकों की छवि ऐसे एकसार समुदायों के रूप में प्रस्तुत करने में सफल होते हैं जो राष्ट्र.विरोधी और हिंदू.विरोधी हैं। वे सोशल मीडिया के जरिए अल्पसंख्यकों के पवित्र और धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर अल्पसंख्यकों को भड़काने की कोशिश भी करते रहते हैं।
सच तो यह है कि देश में धार्मिक ध्रुवीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि अलग.अलग समुदायों के दो व्यक्तियों के बीच कोई छोटा.सा विवाद भी सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर लेता है। सोमनाथ में ऑटोरिक्षा चालक को दस रूपए कम देने के विवाद से भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 25 लोग घायल हो गए। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांप्रदायिक हिंसा पर दस साल के लिए रोक लगाने की बात कही है। परंतु या तो उनकी पार्टी के सदस्य अपने नेता की बात नहीं मान रहे हैं और या फिर भाजपा में कार्यों का स्पष्ट विभाजन है.प्रधानमंत्री विकास की बात करते हैं और अन्य नेता अपना काम करते हैं।
लगातार दुष्प्रचार के जरिये समाज का ध्रुवीकरण तो हुआ ही है आम लोगों के दिमागों में जहर भर गया है और अल्पसंख्यक अपने आप को गंभीर खतरे में महसूस करने लगे हैं। यह इससे भी स्पष्ट है कि सभी जातियों के लोगों ने अपने अल्पसंख्यक.विरोधी रूख के चलते,लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,एक रणनीति के तहत बहुत अधिक हिंसा नहीं कर रहे हैं। वे हिंसा की बजाए लोगों के दिमागों का सांप्रदायिकीकरण करने में जुटे हैं ताकि देश में 1992.93 व 2002 से भी बड़े दंगे करवाये जा सकें। परंतु यह तभी करवाया जायेगा जब सरकार अलोकप्रिय हो जायेगी।
-इरफान इंजीनियर

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश:लोकतंत्र और जनता के विरुद्ध सरकार और कारपोरेट की दुरभिसंधि

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश:लोकतंत्र और जनता के विरुद्ध सरकार और कारपोरेट की दुरभिसंधि--  लोक संघर्ष 


भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनस्र्थापना कानून 2013 भाजपा के सुझावों को  शामिल करके उसके समर्थन से संसद में पारित हुुआ था। कानून को स्वीकृति देने वाली संसदीय समिति की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन थीं जो वर्तमान लोकसभा की अध्यक्ष हैं। यह कानून जनवरी 2014 से अमल में आया। इस कानून में अधिग्रहण की जाने वाली जमीन के लिए किसानों को उचित मुआवजा देने और उनकी पूर्व अनुमति संबंधी प्रावधानों को पहले के 13 कानूनों पर एक साल के अंदर लागू करने की व्यवस्था भी की गई थी। उपनिवेशवादी दौर के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह यह कानून लाया गया था। 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीतियों के चलते किसानों-आदिवासियों की भारी तबाही, सामजिक तनाव और पर्यावरण विनाश के चलते दबाव में आई यूपीए सरकार ने यह कानून बनाया। इसके तहत भूमि अधिग्रहण यदि सरकार द्वारा होता है तो 70 प्रतिशत और कंपनियों द्वारा सीधे होता है तो 80 प्रतिशत लोगों की स्वीकृति अनिवार्य है। इसके साथ सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) का प्रावधान भी अनिवार्य बनाया गया है।
अध्यादेश में कानून की धारा 10 ए में संशोधन किया गया है कि पांच क्षेत्रों - औद्योगिक गलियारों, पीपीपी (सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजनाओं), ग्रामीण ढांचागत सुविधाओं, रक्षा उत्पादन और आवास निर्माण योजनाओं - के लिए किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण में पूर्व अनुमति और एसआईए की बाध्यता नहीं होगी। इन क्षेत्रों के लिए बहुफसली सिंचित जमीन भी सीधे ली जा सकती है। सरकार ने यह अध्यादेश लाने का फैसला संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने पर 29 दिसंबर को किया। राष्ट्रपति ने जल्दबाजी का कारण पूछा तो सरकार के तीन मंत्री उन्हें स्पष्टीकरण दे आए और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। इस कानून से किसानों-आदिवासियों की उनकी जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया में जो भूमिका बनी थी, अध्यादेश ने उसे खत्म कर फिर से नौकरशाही और कारपोरेट घरानों को दे दिया है। इन संशोधनों के पक्ष में भाजपा नेता जो तर्क दे रहे हैं, वे कानून बनने के समय देने चाहिए थे। जाहिर है, अध्यादेश लाकर सरकार ने आम चुनाव में कारपोरेट घरानों के समर्थन का मोल चुकाया है।   
ऐसा माना जाता है कि कारपोरेट घरानों ने मनरेगा, भूमि अधिग्रहण कानून और खाद्यान्न सुरक्षा कानून जैसे कदमों से खफा हो मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी की जगह नरेंद्र मोदी पर दांव लगाया था। मनमोहन सिंह शास्त्रीय ढंग से नवउदारवाद के रास्ते पर चलने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री थे। जबकि नरेंद्र मोदी अंधी छलांगें लगा रहे हैं। भाजपा का मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री बताने का प्रचार निराधार था। हालांकि, चुनावी जीत में वह प्रचार काफी कारगर रहा। वे भारत में नवउदारवाद के जनक और प्रतिष्ठापक के बतौर सबसे मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में याद किए जाएंगे। उन्होंने भारत की आर्थिक नीति और उनके लक्ष्य को संविधान की धुरी से उतार कर नवउदारवादी प्रतिष्ठानों - विश्व  बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष , विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच, विविध बहुराष्ट्रीय कंपनियों आदि - की धुरी पर प्रतिष्ठित कर दिया। वे पूरी समझदारी से मानते थे कि विकास का पूंजीवादी रास्ता ही ठीक है। हर्षद मेहता प्रकरण से लेकर भ्रष्टाचार के अद्यतन घोटालों तक उनकी पेषानी पर शिकन नहीं आती थी तो इसीलिए कि वे ईमानदारी से मानते थे कि पूंजीवादी विकास का रास्ता भ्रष्टाचार से होकर गुजरता है। नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही विस्तार हैं इसलिए उनकी सरकार में वही सब नीतियां और कारगुजारियां हैं। लेकिन दोनों में फर्क भी है। मनमोहन सिंह न सत्ता के भूखे थे, न नवउदारवादी उपभोक्तावाद की चकाचैंध से आक्रांत। नरेंद्र मोदी के अति उत्साह के पीछे ये दो कारक सर्वप्रथम हैं।
यह संविधान की मूल भावना में है और 1987 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि अध्यादेश  आपात अथवा असामान्य स्थिति में ही लाना चाहिए। ध्यान किया जा सकता है कि अध्यादेशों का सिलसिला मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री काल में ही  शुरू हो गया था। वाजपेयी सरकार ने उसे तेजी से आगे बढ़ाया। यूपीए सरकार भी अध्यादेशों की सरकार थी। लेकिन सात महीना अवधि की मौजूदा सरकार ने संसद के सत्र के समानांतर और समाप्ति पर नौ अध्यादेश लाकर संसदीय लोकतंत्र को अभी तक का सबसे तेज झटका दिया है। यह कहना कि अध्यादेशों से संसदीय लोकतंत्र को आघात पहुंचता है, जैसा कि कुछ अंग्रेजी टिप्पणीकारों ने भी कहा है, महज तकनीकी आलोचना है। सवाल है कि पहले की या मौजूदा सरकार ऐसा क्यों करती हैं? इसका उत्तर यही हो सकता है कि सरकारें यह कारपोरेट पूंजीवाद के वैष्विक प्रतिष्ठानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कारपोरेट घरानों के हित में करती हैं।
नवउदारवादी दौर में चुनाव अत्यंत मंहगे हो गए हैं। खबरों के अनुसार पिछले आम चुनाव में भाजपा ने बीस से पच्चीस हजार करोड़ और कांग्रेस ने दस से पंद्रह हजार करोड़ रुपया खर्च किया। यह धन कारपोरेट घरानों से आता है। प्रधानमंत्री बनने के दावेदार नेता पूंजीपतियों के संगठनों/सम्मेलनों में शामिल होकर खुले आम कहते हैं, हमें जितवाइये हम आपका काम करेंगे। भारतीय लोकतंत्र को कारपोरेट घरानों ने हाईजेक कर लिया है। भूमि अधिग्रहण कानून लागू होने के चार महीने बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में बनी भाजपा सरकार ने उसे बदलने की मंशा जाहिर कर दी थी। तीस प्रतिशत समर्थन को वह मतदाताओं की नहीं, कारपोरेट घरानों की देन मानती है। ऐसे में बड़े बिजनेस घरानों का हित सरकार के लिए सर्वोपरि हो जाता है। चुनाव में कारपोरेट घरानों का धन नहीं रुकेगा तो उनके हित में लाए जाने वाले अध्यादेश  भी नहीं रुकेंगे।  
इस अध्यादेश  से जल, जंगल, जमीन का पहले से उलझा मसला और जटिल होगा। मंहगा मुआवजा मिल जाने से किसानों-आदिवासियों का ‘मोक्ष’ नहीं हो जाता है। ज्यादातर किसान छोटी जोत वाले होते हैं। जमीन अधिग्रहण के चलते उनमें ज्यादातर न घर के रहते हैं न घाट के। मोटा मुआवजा अक्सर फिजूलखर्ची और व्यसन में जल्दी ही खत्म हो जाता है। बहुत कम लोग मुआवजे का समझदारी से दूरगामी उपयोग कर पाते हैं। गांव की जमीन पर निर्भर रहने वाली दलित एवं कारीगर जातियों को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के समय से ही कोई मुआवजा राशि, आवासीय प्लाॅट या नौकरी नहीं मिलती है। ऐसे में बिना पूर्व अनुमति और सामाजिक प्रभाव आकलन के जमीन अधिग्रहण से सामाजिक विग्रह तो बढ़ेगा ही, नक्सली हिंसा में इजाफा हो सकता है।
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का एक महत्वपूर्ण सबक यह है कि कुछ भले लोगों का नवउदारवादी दायरे में सरकार के सलाहकार बन कर किसानों-आदिवासियों-मजदूरों को कुछ राहत दिलवाने का गैर-राजनीतिक प्रयास स्थायी नहीं हो सकता। उन्हें समझना होगा कि जनता की जिस जागरूकता और सक्रियता की वे बात वे अपने एनजीओ कर्म के तहत करते हैं, उसका बिना राजनीतिक सक्रियता के कोई अर्थ नहीं है।  
कांग्रेस समेत ज्यादातर पार्टियों ने इस अध्यादेश  का विरोध किया है। कई जन संगठन, किसान संगठन और महत्वपूर्ण लोग भी विरोध में हैं। जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने अपने बयानों और लेखों में कड़ी आलोचना दर्ज की है। हो सकता है भाजपा का किसान प्रकोष्ठ भी विरोध करे। उससे संबद्ध मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने सरकार के खिलाफ हाल में हुई कोल माइंस वर्कर्स यूनियन की सांकेतिक हड़ताल में अन्य मजदूर संगठनों के साथ मिल कर हिस्सा लिया है। यह विरोध तभी सार्थक है जब ये सब पार्टियां और संगठन नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का भी विरोध करें। यानी विकास के पूंजीवादी माॅडल का विरोध। विरोध के साथ कुछ फौरी कदम भी उठाने चाहिए। राजनीतिक पार्टियों को भूमि अधिग्रहण कानून की मजबूती के साथ, जैसा कि सोशलिस्ट पार्टी की मांग है, एक भूमि उपयोग आयोग (लैंड यूज कमीशन) बनाने की पहल करनी चाहिए। उसमें किसानों और आदिवासियों का समुचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में किसान आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उसके कई महत्वपूर्ण विचारक ओर नेता रहे हैं। आजादी के बाद चैधरी चरण सिंह से लेकर नंजुदास्वामी व किशन पठनायक तक खेती-किसानी के स्वरूप व समस्याओं पर गहराई से विचार करने वाले लोग हुए हैं। इस  विरासत को विकास के विमर्ष  का हिस्सा बनाना चाहिए।
-प्रेम सिंह

शिक्षा का साम्प्रदायीकरण

शिक्षा का साम्प्रदायीकरण
हिन्दू राष्ट्र  की स्थापना की अपनी रणनीति को पूरा करने के लिए आरएसएस और भाजपा समूचे समाज का साम्प्रदायीकरण करना चाहती है और इसके लिए वे शिक्षा को वैचारिक प्रभुत्व कायम करने के लिए हथियार के रुप में उपयोग कर रही है। अपने बल पर बहुमत के साथ सत्ता  में आने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद , एक बार फिर युवाओं के मस्तिष्क  को प्रदूशित करने का काम शुरु हो गसा है। शिक्षा के जरिए भावी पीढ़ियों को भ्रष्ट  करने का काम एक ऐसी कला है, जिसे हिटलर ने अपने मुहावरे में व्यक्त किया था- "युवाओं पर काबू पाओं।"आर्य  श्रेष्ठता और नस्लीय घृणा के अपने ऐजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए नाजियों ने सम्पूर्ण शैक्षिक पाठयक्रम में बदलाव किये थे। युवा मस्तिष्क  को साम्पगदायिक जहर से दूषित करने के लिए प्रेरणा आरएसएस-भाजपा को हिटलर की इसी विचारधारा और मुहावरे से मिलती है।
              भाजपा नेताओं ने घोषित तौर पर पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम में बदलाव लाने  के अपने इरादों की घोषणा की है ।पूर्व भाजपा अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री एम वैंकैया नायडू ने पिछले वर्ष 23 जून  , 2013 को दृढ़ता पूर्वक यह ब्यान दिया था कि "यदि भाजपा सत्ता  आती है ,तो वह पाठ्यपुस्तकों तथा पाठ्यक्रमों में बदलाव करेगी । " वे इसके लिए क्षमा प्रार्थी नहीं हैं कि जब वे पहली बार सत्ता में आये थे , उन्होंने तब भी ऐसा प्रयास किया था : " हमने पहले भी इसका इसका प्रयास किया था और आगे भी ऐसा करेंगे । "  अब वे अपने दम पर बहुमत के साथ लोक सभा में सत्ता में वापस आये हैं और गठबंधन की राजनीति के खींचतान से  मुक्त हैं , इसलिए वे चाहते हैं कि इस बार यह बदलाव सुनिश्चित हो । 
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह , जो कुछ समय पहले तक भाजपा के अध्यक्ष भी थे , ने 23 जुलाई 2014  को राज्य सभा में इस और इशारा भी किया है । देश में बढ़ रहे अपराधों पर बोलते हुए राज्य सभा में उन्होंने कहा : " जनता के दृष्टिकोण में बदलाव लाने के लिए मूल्यों को उनके दिमाग में बैठाने की जरूरत है " और कि " जीवन मूल्यों और मानवीय मूल्यों के प्रति बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूली पाठ्य पुस्तकोँ में बदलाव प्रस्तावित किये गए हैं । "
मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने भी ब्यान दिया है कि देश की शिक्षा नीति में सुधार करने के लिए  राज्य वार और क्षेत्र वार राष्ट्रीय बहस शुरू करने की पहल कदमी की जाएगी । हैदराबाद में " भारतीय मूल्य -दृष्टिकोण के साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन " नामक संगोष्ठी में  बोलते हुए  उन्होंने कहा : " 1986   राष्ट्रीय शिक्षा नीति सूत्रबद्ध की गयी थी । 2014  में नयी आशा आकाँक्षाओं और सम्भावनाओं वाले भारत के लिए ,  नयी शिक्षा नीति की  जरूरत है , जो एक मजबूत , अटूट तथा मानवीय उदीयमान राष्ट्र का निर्माण कर सके । 
आरएस एस  भाजपा को निर्देशित करती है । ये सभी व्यक्ति आर एस एस से ही पैदा हुए हैं और उसके प्रति अपने कर्तव्य को  निबाह  रहे हैं । भाजपा की चुनावी सफलता से उत्साहित होकर अब आर एस एस  और उससे संबद्ध संगठन अपने "लोगों" को शासन स्तर पर हुए "राजनैतिक परिवर्तन " को "सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन " में रूपांतरण को सुनिश्चित  करने के  काम में लगा रहे हैं । यही कारण  है कि वे समूची शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन के लिए पहल कदमी कर रहे हैं और इसके लिए वे मानव संसाधन विकास मंत्री से 6 बार मिल भी चुके हैं और अपने मंसूबों के अनुरूप  शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाने  के लिए निर्देशित कर चुके हैं । 
आर एस एस से संबद्ध  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (एस एस यू एन ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा , जिन्होंने भाजपा के पहले शासनकाल के दौरान शिक्षा का सांप्रदायीकरण करने के मामले में बहुत बदनाम भूमिका अदा की थी , असंदिग्ध ढंग से कहा है : " राजनैतिक परिवर्तन हो चुके हैं , अब शिक्षा में पूर्ण बदलाव होना चाहिए " 

रविवार, 11 जनवरी 2015

28 फरवरी 2015

 हरयाणा विज्ञान मंच के सेक्टरिएट की मीटिंग कल 11. 1. 2015 को रोहतक में हरयाणा विज्ञान मंच के दफ्तर में सुबह 11 बजे हुई जिसमें डॉ महावीर नरवाल , डा रणबीर दहिया , सुश्री दीपा जी , श्री कृष्ण वत्स , श्री वेदप्रिया , श्री शीशपाल , श्री सतबीर नागल ने भागीदारी की ।  28 फ़रवरी को "नेशनल साइंस डे "मनाने का फैंसला किया ।  इससे पहले हरयाणा के स्कूलों , कालेजों और यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों में एक एस्से राइटिंग कम्पेटेशन करवाने का फैंसला किया गया । 28 फरवरी को एक साइंस मेले का आयोजन किया जायेगा जिसमें हजारों विद्यार्थी , नागरिक व साइंस ज्ञानी हिस्सा लेंगे । आप सब भी आमंत्रित हैं इस अनोखे साइंस मेले में भाग लेने के लिए । भूलना नहीं 28 फरवरी 2015 ।