मंगलवार, 16 जून 2015

मार्क्सवाद और विज्ञान

मार्क्सवाद और विज्ञान

विज्ञान आधुनिक  समाज को बहुत गहरे तक प्रभावित कर रहा है। कम्प्यूटर से लेकर वैश्विक उष्णता तक, अंग-प्रत्यारोपण से लेकर कलोन तक, रोबोट से लेकर अन्तरिक्ष अभियानों तक तथा शिक्षा स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, उर्जा या खेल आदि का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहां समाज विज्ञान की ओर न ताकता हो। इसलिए जरूरी हो जाता है कि विज्ञान को समझा जाए। मार्क्सवादियों के लिए विज्ञान किस तरह महत्वपूर्ण है ये और बात है, लेकिन विज्ञान के लिए मार्क्सवाद को समझना ज्यादा जरूरी है। मार्क्सवाद कहता है कि विज्ञान को सामाजिक व ऐतिहासिक परिस्थितियों से अलग करके अमूर्त बना कर नहीं समझा जा सकता। इसके साथ मार्क्सवाद यह भी स्वीकार करता है कि सामाजिक बुनावट के साथ चलते विज्ञान की अपनी भी वस्तुनिष्ठ वैधता   है। मार्क्सवाद विज्ञान का अच्छा आलोचक होने के साथ-साथ इसका रक्षक भी है। इस बात की आलोचना क्यों नहीं होनी चाहिए कि पूंजीवादी व्यवस्था में न जाने कितनी वैज्ञानिक खोजों का दुष्प्रयोग होता है। यह क्या बात हुई कि काम को आसान बनाने व काम की गति तेज करने के नाम पर तकनीक न जाने कितने ही लोगों को बेरोजगार बना दे।
मार्क्सवाद की एक मौलिक मान्यता यह है कि इस विश्व को समझने व इस पर नियंत्राण करने की क्षमता मनुष्य में है। प्रकृति विज्ञान के विकास ने भी मनुष्य के इस विजय गान की घोषणा की है। मार्क्स और एंगेल्स का विज्ञान प्रेम इसी बात से जाहिर है कि उन्होंने अपने कार्य ‘सामाजिक विकास के इतिहास’ को वैज्ञानिक व भौतिक आधर पर प्रस्तुत किया है। वैज्ञानिक दार्शनिकों का एक बड़ा खेमा यह मानता है कि स्वयं विज्ञान के अन्दर अपना एक विचार समूह का ढांचा है, अपनी निश्चित विध् िहै जो इसके रेशनल और वस्तुनिष्ठ होने की गारंटी करती है। जबकि मार्क्सवाद यह कहता है कि विज्ञान भी एक सामाजिक ताने-बाने से बुने हुए व्यवहार में पैदा होता है। जिस प्रकार समाज स्थिर नहीं है, उसी प्रकार विज्ञान की संकल्पनाएं  और विध् िभी समय आने पर बदलती है। विज्ञान के अन्य दार्शनिक जो ये कहते हैं कि विज्ञान की अपनी कोई विध् िया सि(ांत नहीं है, इसकी प्राप्तियों की कोई वस्तुनिष्ठ वैध्ता नहीं है, उनके लिए मार्क्सवाद का कहना है कि विज्ञान प्रकृति के रहस्यों पर से परदा हटाने का एक विशिष्ट तरीका है। विज्ञान का विकास बनी-बनाई और वर्चस्वकारी विचारधराओं की मान्यताओं को जांचने-परखने का एक जरिया है।
स्वयं मार्क्स ने विज्ञान पर कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। लेकिन अपने पूरे साहित्य में वे विज्ञान की प्रकृति और इसकी कार्यविध् िपर लगातार टिप्पणियां करते हैं। ऐसा लगता है मानो वे अपने पूरे साहित्य ‘‘समाज का ऐतिहासिक, आर्थिक एवं राजनैतिक विश्लेषण’’ को किसी प्रकृति विज्ञानी की खोज के सामने रख कर देख रहे हों। विज्ञान के बारे में मार्क्स के विचार उनकी लिखी पुस्तकों में नजर आते हैं। मार्क्स के समकालीन अध्किांश विचारक ये मानते थे कि ‘ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभव ज्ञान’ ही विज्ञान का आधर है। मार्क्स व्यवहारवादियों ;म्उचमतपबपेजेद्ध के इस विचार को नकारते हैं। मार्क्स एक यथार्थवादी विचारक थे, उनके अनुसार पदार्थीय विश्व का स्वतंत्रा अस्तित्व है। यहां एक सवाल उठता है कि क्या वस्तुनिष्ठ सच्चाई मानव सोच का एक सै(ांतिक प्रश्न है या व्यवहारिक प्रश्न। अर्थात विचार वास्तविक है या अवास्तविक? इस सवाल पर मार्क्स के विचारों को लेकर बहुत भ्रम रहे। मार्क्स ने इसे बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा है-जिस प्रकार दर्पण किसी वस्तु ;पदार्थद्ध को प्रतिबिम्बित करता है, उसी प्रकार विचार मानव मस्तिष्क रूपी दर्पण में वस्तुओं का बना प्रतिबिम्ब है जो अनेक रूपों में दिखाई देता है।
मार्क्स इसे आगे स्पष्ट करते हैं कि यह इतना आसान भी नहीं है कि प्रकृति के सामने एक दर्पण रख देंगे और सच ;ज्ञानद्ध सामने दिखाई दे जाएगा। ज्ञान केवल तभी प्राप्त होगा जब हम सतह के नीचे होने वाली सभी हलचलों को समझ कर कोई रचनात्मक सि(ांत बनाएंगे, एक ऐसा सि(ांत जो प्रेक्टिस में खरा उतर जाए। सच का दावा करने वाली चीज के बारे में सि(ांत देना एक बात है परन्तु ज्ञान के बारे में सि(ांत ;जो बताए कि सच कैसे खोजा जाता हैद्ध देना बिल्कुल अलग बात है। वे ही विचार ठीक माने जाते हैं जो स्वतंत्रा यथार्थ के साथ संगति करते हैं। सबसे मुख्य बात जो मार्क्स कहते हैं, वह यह है कि समय और इतिहास से स्वतंत्रा ऐसी कोई संकल्पनाएं नहीं जिनसे विज्ञान के सि(ांत गढ़े जा सकें तथा समय और इतिहास से स्वतंत्रा ऐसी कोई विज्ञान विध् िनहीं जिस पर इन सि(ांतों को परखा जा सके।
मार्क्स विज्ञान में एक द्वन्द्वात्मक प्रव्रिफया देखते हैं कि इस भौतिक विश्व में विज्ञान की विध् िव संकल्पनाएं और इसके सि(ांत काल खण्डों में आपस में गतिशील अन्तःव्रिफयाएं करते रहते हैं। यह प्रव्रिफया सच के और निकट ले जाती है। इसके इलावा वे विज्ञान में एक और द्वन्द्वात्मकता देखते हैं कि इन अन्तःव्रिफयाओं के चलते एक समय विशेष पर कुछ मूलभूत परिवर्तन होते हैं और एक नई चीज सामने आती है। इस प्रकार वे पूरी प्रव्रिफया को एक चलायमान परिस्थिति में देखते हैं। वे ये भी मानते हैं कि यह प्राकृतिक विश्व बहुत ही जटिल और विविध् है और इसकी द्वन्द्वात्मकता इसी में है कि एक विशेष मोड़ तक प्रकृति के पहलुओं को इसके सापेक्ष एक अमूर्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाए और ये अमूर्त मॉडल और अध्कि ठोस परिस्थितियों को शामिल करते हुए एक ज्यादा विकसित मॉडल के रूप में सामने आए। मार्क्स अपने आर्थिक विश्लेषण को भी इसी रूप में देखते हैं।
विज्ञान के बारे में मार्क्स के विचारों पर सबसे ज्यादा ठोस लेखन एंगेल्स की पुस्तकों में है। एंगेल्स की श्क्पंसमबजपबे व िछंजनतमश् एक ऐसी पुस्तक है जिसमें एक पूर्ण वैज्ञानिक विश्वदृष्टिकोण की झलक मिलती है। उन्नीसवीं सदी का मध्य ऐसी वैज्ञानिक खोजों का समय था जब विज्ञान संव्रफमण काल में था, और इसके साथ ही नए समाज की पृष्ठभूमि भी तैयार हो रही थी। यह पुस्तक प्रकृति और समाज के बीच मौलिक एकता का सबसे अच्छा उदाहरण है। इस पुस्तक में एंगेल्स तीन महान वैज्ञानिक खोजों के हवाले से प्रकृति की द्वन्द्वात्मकता दर्शाते हैं। पहली थी 1838-39 ;डश्र ैबीसमपकमद ंदक ज्ण् ैबीूंददद्ध में हुई पादप व जन्तु कोशिका के बीच एकता के सूत्रा तथा कोशिका सि(ांत ;कोशिका जीवन का आधरद्ध। इसमें सजीवों की एकता के सूत्रा छिपे थे। दूसरी थी 1842-47 के बीच ;श्र त् डंलवतए श्र च् श्रवनसमए ॅ त् ळतवअमए स् । ब्वसकपदह ंदक भ्ण् भ्मसउवज्रद्ध हुई उफर्जा की संरक्षता का नियम। इसके अन्तर्गत इस प्रकृति में पदार्थ की अनवरत गति ;संव्रफमणशीलताद्ध यात्रा उफर्जाओं के रूपान्तरण के माध्यम से सि( हो गई थी। तीसरी महत्वपूर्ण खोज थी 1859 में डार्विन के द्वारा प्रस्तुत पुस्तक श्व्द जीम व्तपहपद व िैचमबपमे इल उमंदे व िछंजनतंस ैबसमबजपवदश्ण् इन पुस्तकों ;खोजोंद्ध के माध्यम से दर्शन के नजरिए से प्रकृति की भौतिक संकल्पना में द्वन्द्वात्मकता स्पष्ट हो चुकी थी।
मार्क्स व एंगेल्स के बीच अच्छा तालमेल था। उन्होंने अपने काम का बंटवारा किया हुआ था। मार्क्स गणित, तकनीक के इतिहास व रसायन शास्त्रा में निपुण थे, जबकि एंगेल्स गणित, भौतिकी, जीव-विज्ञान, प्राणीशास्त्रा व खगोलविज्ञान में निपुण थे। यदि हम विज्ञान के इतिहास का अध्ययन करें तो

बिल्ली

बिल्ली

शाम का समय था। रामदीन खेत से घर वापस आ रहा था। राह में उसके आगे से एक बिल्ली गुजरी। वह एकदम ठहर गया। वह राह में किसी एक खेत के किनारे बैठ गया। वह सोच में पड़ गया। उसने सुना हुआ था-बिल्ली का रास्ता काटना शुभ नहीं होता। वह मन-ही-मन चाह रहा था कि कोई रास्ता पहले पार करे। यह आम रास्ता था। लेकिन आना-जाना इस समय अधिक नहीं था। उसे बैठे हुए पन्द्रह मिनट हो गए। उसे पीछे एक साइकल सवार आता दिखाई दिया। उसे राहत मिली। वह सोचने लगा, इसके गुजर जाने के बाद वह चल पड़ेगा।
साइकल सवार रामदीन के पास आकर रुक गया। वह रामदीन से परिचित नहीं था। साइकल सवार ने समझा कि रामदीन कोई राहगीर है। यह थककर बैठ गया होगा।
उसने रामदीन से पूछाः आप किस की बाट देख रहे हैं? रामदीन ने वैसे ही उत्तर दियाः मैं थक गया था। थोड़ा सुस्ताने के लिए बैठ गया था।
रामदीन साफ-साफ नहीं बताना चाहता था।
साइकल सवार ने कहा-मेरी साइकल पर पीछे बैठ जाओ। बड़ी सड़क तक मैं ले चलूंगा। रामदीन लेट हो रहा था। वह जाना भी चाहता था। उसे फिर बिल्ली याद आ गई। उसने मन में सोचा, साइकल सवार भी जा रहा है। वह तो पीछे बैठेगा। मुझ से आगे वो साइकल सवार है। यह सोचकर वह साइकल पर बैठ गया।
रामदीन उलझन में था। उसने साइकल सवार से बात छिपाई थी। उसने साइकल सवार से साफ-साफ बताने का फैसला कर लिया। रास्ता ज्यादा साफ-सुथरा नहीं था। बड़ी सड़क एक कोस दूर थी। सड़क आने मंे लगभग बीस मिनट लगना था।
रामदीन ने साइकल सवार से कहा-भाई, मैंने आप से छिपाया था। असल में बात ये है कि बिल्ली रास्ता काट गई थी। मैं इसलिए बैठ गया था। मैंने सुना है, बिल्ली का रास्ता काटना शुभ नहीं होता। इतना कह कर रामदीन का मन हलका हो गया। रामदीन यह भी सोचने लगा कि कहीं साइकल सवार बुरा न मान जाए।
साइकल सवार ने सुन लिया, परंतु कहा कुछ नहीं। रामदीन ने फिर पूछा-क्या बिल्ली के रास्ता काटने को आप अशुभ नहीं मानते? साइकल सवार ने उत्तर दिया-भाई, मैंने तो बिल्ली देखी नहीं। मुझ पर क्या फरक पड़ेगा।
रामदीन ने सोचा कि साइकल सवार ठीक कह रहा है। उसके कुछ बोलने से पहले ही साइकल सवार ने रामदीन से एक सवाल कर दिया।
बिल्ली बाएं से दाएं गुजरी थी या दाएं से बाएं? सवाल सुनकर रामदीन कुछ असहज हो गया। वह संभल कर बैठा। उसे ऐसे सवाल की आशा नहीं थी। उसे पता था कि बिल्ली किधर से गुजरी थी। वह यही समझा कि हो सकता है इसका भी कोई फरक पड़ता हो। उसके जवाब देने से पहले ही, साइकल सवार ने दो सवाल और कर दिए।
बिल्ली कैसे रंग की थी?
बिल्ली थी या बिल्ली का बच्चा?
रामदीन का सिर चकराने लगा। उसे क्या पता था कि बात यहां तक आ जाएगी। उसके मन में आया-हो सकता है साइकल सवार ये सारी बातें जानता हो। उसने ये भी सोचा-हो सकता है साइकल सवार इन बातों को मानता ही न हो। उसने ये भी सोचा-जिकर नहीं करता तो ही अच्छा था। लेकिन अब तो बात चल पड़ी थी। बात भी उसी ने चलाई थी।
रामदीन को कुछ नहीं सूझ रहा था। वह जवाब दे तो क्या। उसने हिम्मत करके साइकल सवार से पूछ ही लिया-क्या आप इन बातों को नहीं मानते?
साइकल सवार कुछ समझदार था। वह जानता था कि रामदीन भोला है। वह सीधे-सीधे कोई उत्तर नहीं देना चाहता था। उसने रामदीन से एक और सवाल कर दिया-भाई, एक बात बता। आप घर के सामने पहुंच जाते हो और आपके आगे बिल्ली आ जाए। आप घर के भीतर जाओगे या नहीं?
रामदीन ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था। उसे लगा-ये साइकल सवार बड़ा अजीब आदमी है।
बातों-ही-बातों में रास्ता कट गया था। बड़ी सड़क के किनारे दोनों उतर गए। बड़ी सड़क पर एक प्याऊ से दोनों ने पानी पीया। रामदीन को सीधे जाना था। साइकल सवार को बाएं सड़क पर जाना था। रामदीन ने साइकल सवार का धन्यवाद किया। सड़क पर चारों ओर की आवा-जाही थी। जैसे ही रामदीन सड़क पर चढ़ने लगा, गजब हो गया। एक बिल्ली चोराहे पर से गुजर गई। रामदीन का चेहरा देखने लायक था। उसने माथे पर हाथ लगाया। वह मन-ही-मन बुदबुदाया-आज यह बिल्ली मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी।
उसने देखा, यातायात उसी तरह चल रहा था। किसे फुरसत थी बिल्ली की सोचने की। रामदीन ने सड़क पार की। वह धीरे-धीरे चल रहा था। वह घर के पास आ गया था। उसे फिर बिल्ली की याद आई। मन-ही-मन कहने लगा-हे भगवान, अब बिल्ली को मत भेजना। भगवान ने रामदीन की मानो सुन ली। कोई बिल्ली नहीं आई। वह घर के भीतर आ गया था।
उसने हाथ-मुंह धोया और खाट पर लेट गया। उसकी पत्नी उसके लिए पानी लेकर आई। रामदीन कुछ मुस्कराया।
उसकी पत्नी बोली-आज क्या खास बात है?
रामदीन बोला-भागवान, आज तो कमाल ही हो गया।
ऐसी क्या बात है, वह बोली।
रामदीन ने कहा-आराम से बैठ और सुन।
वह पास में पीढ़ा लेकर बैठ गई।
रामदीन ने सारी गाथा गा दी।
उसकी पत्नी बोली, पहले आप खाना खा लें।
उसने खाना परोसा। रामदीन खाना खाने लगा।
वह कहने लगी-अब आप थोड़ी ही देर में साक्षरता की क्लास में जाओगे। वहां इस बात की चर्चा करना। फिर सुनना वे क्या कहते है?
रामदीन खाना खा कर पड़ोस में लगने वाली क्लास में आ गया। वह आज कुछ लेट था। उसने सभी से राम-राम की और बैठ गया। आज रामदीन के चेहरे पर कुछ अलग ही बात थी। औरों को भी पहचानने में देर नहीं लगी। इससे पहले कि वे कुछ पूछते, रामदीन ने ही बताना शुरू कर दिया।
वह बोला-मास्टर जी, आज तो आप मेरी उलझन सुलझाओ। आज की पढ़ाई कल कर लेंगे।
सभी उत्सुक थे कि रामदीन क्या बोलता है।
रामदीन ने अपनी सारी रामकहानी कह दी।
सभी मास्टर जी के मुंह की ओर देख रहे थे। वे भी ऐसे सवालों में रुचि रखते थे। मास्टर जी ने ऐसी बातें सुनी हुई थी। वह सब समझता था। वह सोच रहा था कि कैसे जबाब दूं। मास्टर जी ने बारी-बारी सभी से पूछा कि वे क्या कहना चाहते हैं। सभी ने तो अपनी-अपनी राय दी। कइयों ने इसे अशुभ बताया। कइयों ने इसे मन का वहम बताया। कइयों ने बताया कि बात तो चलती ही जा रही है। रामदीन सुन कर सोचने लगा कि बात तो बीच में अटक गई। कोई एक राय तो है नहीं। वह दुविधा में था, कौन सही है कौन नहीं।
अब मास्टर जी की बारी थी। सब ध्यान से सुनने लगे। उन्होंने कहा-भाइयों, बात तो मैंने भी सुनी है। पर एक बात सुनो-आपने एक बात और भी तो सुनी है।
एक ने पूछा-मास्टर जी, कौन सी बात?
मास्टर जी-अपने दीवाली के दिन सब इंतजार करते हैं कि बिल्ली उनके घर आए। उस दिन बिल्ली लक्ष्मी हो जाती है।
कुछ बोले-हां, सुना तो ऐसा भी है।
मास्टर जी-तो भाइयो, क्या दीवाली वाले दिन बिल्ली की तासीर बदल जाती है।
किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या जबाब दें।
मास्टर जी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा-चलो, हम सभी एक महीने तक एक तजुरबा करते हैं। जितनी बार भी हमारे सामने बिल्ली आएगी, हम रुकेंगे नहीं देखेंगे कितनी बार बिल्ली आती है और कितनी बार हमारा काम बनता-बिगड़ता है। एक महीने के बाद हम सब कुल मिलाकर हिसाब लगा लेंगे।
सब को यह बात पसंद आई। सब अपने-अपने घर आ गए। घर आते ही रामदीन की पत्नी बोली-स्याणे, बिल्ली दिमाग से उतरी कि नहीं?
रामदीनः उतरनी क्या थी और चढ़ गई। एक महीने का कोर्स और मिल गया। और सुन-एक महीने तक तूं भी देखिए। उसकी पत्नी बोली-ये तो अच्छी बात है, पहले तजुरबा तो कर के देख लें, फिर देखेंगे। सुनने में तो हजार बातें आती हैं। क्या सारी ही ठीक होती हैं।

- वेदप्रिय, भिवानी

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

राजनैतिक विचारधारा और इतिहास की व्याख्या

लोकसंघर्ष !


Posted: 17 Apr 2015 09:46 AM PDT
यद्यपि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी निवासियों का सांझा इतिहास है तथापि विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं में यकीन करने वाले अलग.अलग समूह, इस इतिहास को अलग.अलग दृष्टि से देखते हैं। दिल्ली में सरकार बदलने के बाद से, कई महत्वपूर्ण संस्थानों की नीतियों में रातों.रात बदलाव आ गया है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर व राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद ;एनसीईआरटी, उन अनेक संस्थाओं में शामिल हैं, जिनके मुखिया बदल दिये गये हैं और नए मुखिया, संबंधित विषय में अपने ज्ञान से ज्यादा, शासक दल की विचारधारा के प्रति अपनी वफादारी के लिए जाने जाते हैं। ये वे संस्थान हैं जो इतिहास व शिक्षा सहित समाजविज्ञान के विभिन्न विषयों से संबंधित हैं। इन संस्थानों की नीतियों व नेतृत्व में परिवर्तन,भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस के इशारे पर किया गया प्रतीत होता है। आरएसएस की राजनैतिक विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद है, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। आरएसएस के सरसंघचालक ने हाल ;3 मार्च 2015 में कहा था कि भारतीय इतिहास का'भगवाकरण' होना चाहिए। उनका समर्थन करते हुए भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारतीय इतिहास का भगवाकरण समय की आवश्यकता है और संबंधित मंत्री को इतिहास की पुस्तकों पर भगवा रंग चढाने में गर्व महसूस करना चाहिए।
इतिहास की किताबों के भगवाकरण से क्या आशय है ? भगवाकरण शब्द को प्रगतिशील व तर्कवादी इतिहासविदों और बुद्धिजीवियों ने तब गढ़ा था, जब वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ;1998 में मानव संसाधान विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा, इतिहास व अन्य समाजविज्ञानों के पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों में व्यापक परिवर्तन करने शुरू किए। जो किताबें मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में लागू की गईं थीं उनमें कई तरह की आधारहीन बातें कही गईं थीं जैसे, चूंकि हम मनु के पुत्र हैं इसलिए हम मनुष्य या मानव कहलाते हैं,वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पेड़.पौधे अजीवित होते हैं परंतु हिंदू, पेड़.पौधों को जीवित मानते हैं और जब बंदा बैरागी ने इस्लाम कुबूल करने से इंकार कर दिया तो उसके लड़के की हत्या कर उसका कलेजा निकालकर, बंदा बैरागी के मुंह में ठूंसा गया। इन पुस्तकों में सती प्रथा को राजपूतों की एक ऐसी परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया थाए जिस पर हम सब को गर्व होना चाहिए। मध्यकाल के इतिहास को भी जमकर तोड़ामरोड़ा गया। जैसे,यह कहा गया कि कुतुबमीनार का निर्माण सम्राट समुद्रगुप्त ने किया था और उसका मूल नाम विष्णुस्तंभ था। इन पुस्तकों में शिवाजी और अफजल खान, अकबर और महाराणा प्रताप, गुरू गोविंद सिंह और औरंगजैब़ के बीच हुए युद्धों.जो केवल और केवल सत्ता हासिल करने के लिए लड़े गये थे.को सांप्रदायिक रंग देते हुए उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इन परिवर्तनों की पेशेवर, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष इतिहासविदों ने तार्किक आधार पर आलोचना की। उन्होंने इतिहास के इस रूप में प्रस्तुतिकरण के लिए 'शिक्षा का भगवाकरण' शब्द इस्तेमाल करना शुरू किया। परिवर्तनों की आलोचना का जवाब देते हुए मुरली मनोहर जोशी ने कहा ;अप्रैल 2003 कि यह भगवाकरण नहीं बल्कि इतिहास की विकृतियों को ठीक करने का प्रयास है। लेकिन अब, बदली हुई परिस्थितियों और परिवर्तित राजनैतिक समीकरणों के चलते, वे उसी शब्द.भगवाकरण.को न सिर्फ स्वीकार कर रहे हैं वरन् उस पर गर्व भी महसूस कर रहे हैं।
भारत में इतिहास का सांप्रदायिकीकरण,अंग्रेजों ने शुरू किया। उन्होंने हर ऐतिहासिक घटना को धर्म के चश्मे से देखना और प्रस्तुत करना प्रारंभ किया। अंग्रेजों के रचे इसी इतिहास को कुछ छोटे.मोटे परिवर्तनों के साथ, हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने अपना लिया। हिंदू सांप्रादयिक व राष्ट्रवादी तत्व कहते थे कि भारत हमेशा से एक हिंदू राष्ट्र है और मुसलमान व ईसाई, भारत में विदेशी हैं। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के लिए इतिहासए आठवीं सदी में मोहम्मद.बिन.कासिम के सिंध पर हमले से शुरू होता था। उनका दावा था कि चूंकि मुसलमान भारत के शासक थे इसलिए अंग्रेजों को इस देश का शासन मुसलमानों को सौंपकर यहां से जाना था। इतिहास के इसी संस्करण का किंचित परिवर्तित रूप पाकिस्तान में स्कूलों और कालेजों में पढ़ाया जाता है।
इसके विपरीत,जो लोग धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति प्रतिबद्ध थे उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी राजा का धर्म, उसकी नीतियों का निर्धारक नहीं हुआ करता था। यही बात स्वाधीनता आंदोलन के सर्वोच्च नेता महात्मा गांधी ने भी कही। अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में वे लिखते हैंए 'मुस्लिम राजाओं के शासन में हिंदू फलेफूले और हिंदू राजाओं के शासन में मुसलमान। दोनों पक्षों को यह एहसास था कि आपस में युद्ध करना आत्मघाती होगा और यह भी कि दोनों में से किसी को भी तलवार की नोंक पर अपना धर्म त्यागने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। इसलिए दोनों पक्षों ने शांतिपूर्वक, मिलजुलकर रहने का निर्णय किया। अंग्रेजों के आने के बाद दोनों पक्षों में विवाद और हिंसा शुरू हो गई.क्या हमें यह याद नहीं रखना चाहिए कि कई हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे और उनकी नसों में एक ही खून बह रहा है? क्या कोई व्यक्ति मात्र इसलिए हमारा दुश्मन बन सकता है क्योंकि उसने अपना धर्म बदल लिया हैक्या मुसलमानों का ईश्वर, हिंदुओं के ईश्वर से अलग है? धर्म, दरअसल,एक ही स्थान पर पहुंचने के अलग.अलग रास्ते हैं। अगर हमारा लक्ष्य एक ही है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि हम अलग.अलग रास्तों से वहां पहुंच रहे हैं? इसमें विवाद या संघर्ष की क्या गुंजाईश है'
स्वाधीनता के बाद अंग्रेजों द्वारा रचे इतिहास को कुछ समय तक पढ़ाया जाता रहा। शनैः शनैः, इतिहास की पुस्तकों को तार्किक आधार देते हुए उनमें इतिहास पर हुये गंभीर शोध के नतीजों का समावेश किया जाने लगा। एनसीईआरटी के गठन के बाद,उन स्कूलों में, जिनमें एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू था, इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या वाली पुस्तकों के स्थान पर एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं। फिर, सन् 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के सत्ता में आने के बादए डॉ.जोशी ने पाठ्यक्रम के सांप्रदायिकीकरण और शिक्षा के भगवाकरण का सघन अभियान चलाया। सन् 2004 में एनडीए सत्ता से बाहर हो गई और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने केंद्र में सत्ता संभाली। इसके बाद, कुछ हद तक, स्कूली पाठ्यपुस्तकों में वैज्ञानिक सोच और तार्किक विचारों की वापसी हुई और पुस्तकों को सांप्रदायिकता के जहर से मुक्त करने के प्रयास भी हुए। चाहे वह पाकिस्तान हो या भारत,इतिहास के सांप्रदायिक संस्करण का इस्तेमाल,धार्मिक राष्ट्रवाद को मजबूती देने के लिए किया जाता है। इसलिए भारत में ताजमहल को तेजो महालय नामक शिव मंदिर बताया जाता है और स्वाधीनता संग्राम को मुसलमानों के खिलाफ लड़ा गया धार्मिक युद्ध। मुस्लिम राजाओं को मंदिरों का ध्वंस करने व हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का दोषी बताया जाता है। इस विभाजनकारी पाठ्यक्रम का इस्तेमाल राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए होता है। पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में मुस्लिम राजाओं का महिमामंडन किया जाता है और हिंदू राजाओं की चर्चा तक नहीं होती।
आरएसएस स्कूलों की एक विस्तृत श्रृंखला का संचालन करता है जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय और विद्या भारती शामिल हैं। इन स्कूलों में इतिहास का सांप्रदायिक संस्करण पढ़ाया जाता है। वर्तमान सरकार की यही कोशिश है कि आरएसएस के स्कूलों का पाठ्यक्रम ही सरकारी शिक्षण संस्थाओं में लागू कर दिया जाए। जाहिर है कि यह खतरनाक कदम होगा। इससे विविधताओं से भरे हमारे बहुवादी देश में विघटनकारी ताकतें मजबूत होंगी।
-राम पुनियानी
 
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

धर्म के नाम पर अधर्म का उन्माद

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

धर्म के नाम पर अधर्म का उन्माद

 अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में गत् 19 मार्च को फरख़ंदा नामक· एक 27 वर्षीय मुस्लिम लड़की को  स्वयं को धर्म के ठेकेदार बताने वाले मुस्लिम उन्मादियों की  हज़ारों की  भीड़ द्वारा जि़ंदा जला कर मार डाला गया तथा उसकी जली हुई क्षत-विक्षत लाश को काबुल नदी में इन्हीं उन्मादी आसामाजिक तत्वों द्वारा फेंक दिया गया। उन्मादियों का आरोप है कि इस युवती ने कुरान शरीफ को जलाकर इस धार्मिक किताब के साथ बेअदबी की थी। जबकि दूसरी ओर लड़की के भाई नजीबुल्ला मलिकज़ादा तथा फरख़ंदा के पिता ने ऐसे सभी आरोपों को  झूठा करार दिया है। फरख़ंदा के परिजनों  का कहना है कि वह पांचों वक्त की नमाज़ नियमित रूप से अदाक रती थी। उसने इस्लामिक स्टडीज़ में डिप्लोमा भीकर रखा था। इतना ही नहीं बल्कि वह नियमित रूप से कुरान शरीफ की तिलावत भी किया करती थी तथा अपने धर्म व धार्मि· पुस्तकों का दिल से सम्मान करती थी। लिहाज़ा उसपर लगाए जाने वाले सभी आरोप झूठे व निराधार हैं। कुरान शरीफ जलाए जाने की घटना से फरख़ंदा का कोई लेना-देना नहीं है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने इस घटना के संबंध में अपनी जांच के बाद यह पाया है कि फरखंदा मानसिक रोगी थी। इस युवती को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने व उसके बाद उसे जलाए जाने व उसके शव को नदी में फेंके जाने जैसी अमानवीय घटना ने अफगानिस्तान सहित पूरे विश्व के मानवता प्रेमियों को विचलितकर दिया है। इस घटना के विरोध में अफगानिस्तान में उदारवादी वर्ग के लोग खासतौर पर महिलाओं द्वारा ज़बरदस्त रोष व्यक्त किया जा रहा है।

                इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का एक दु:खद पहलू यह भी था कि जिस समय धर्मांध लोगों कीउग्र भीड़ द्वारा फरखंदा को पीटा व जलाया जा रहा था उस समय अफगानिस्तान पुलिस के कर्मचारी तमाशाई बने इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गऩी ने भी इस घटना को एक जघन्य अपराध बताया है। तथा पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए आयोग गठित करने का आदेश दिया है। राष्ट्रपति गऩी ने यह भी स्वीकार किया कि जिस पुलिस ने तालिबानों के विरुद्ध संघर्ष करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  है वही अफगान पुलिस ऐसी घटनाओं से निपटने हेतु पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अफगान पुलिस का 90 प्रतिशत ध्यान तालिबान विरोधी लड़ाई की ओर रहता है जबकि यह उनकी संवैधानिक भूमिका  नहीं है। बहरहाल सूत्रों के  मुताबिक· फरखंदा की इस बेरहम हत्या के आरोप में 21 लोगों को गिरफ्तार  किया गया है जिनमें 8 तमाशबीन पुलिस·र्मी भी शामिल हैं। इस घटना के विरुद्ध अफगानिस्तान की महिलाओं के  गुस्से का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि  जो मुस्लिम महिलाएं आमतौर पर शव यात्रा में शामिल नहीं होतीं तथा किसी शव यात्रा में उन्हें मर्दों के साथ कब्रिस्तान में जाने की  इजाज़त नहीं होती उन्हीं महिलाओं ने बड़ी संख्या  में फरखंदा की शव यात्रा में न केवल शिरकत कीबल्कि उसके  शव को नहलाने-धुलाने से लेकर उसके ताबूत को कंधा देने व उसके अंतिम संस्कार यानी  कब्र में उतारने तक में आक्रोशित मुस्लिम महिलाएं नकाब पहने हुए अग्रणी भूमिका में रहीं। शव यात्रा के  पूरे मार्ग में महिलाओं द्वारा अल्लाह ओ अकबर की सदाएं बुलंद की गईं तथा प्रदर्शन रूपी इस शव यात्रा में सरकार से यह मांग की गई की महिलाओं तथा मानवता के विरुद्ध इस प्रकार का जघन्य अपराध अंजाम देने वाले समस्त अपराधियों व उनके समर्थको को ·ड़ी सज़ा दी जाए। इस घटना से एक बात और साबित हो रही है कि अफगानिस्तान की जो पुलिस उन्मादी भीड़ के हाथों से एक लड़कीको जि़ंदा नहीं बचा सकी वह पुलिस तालिबानों अथवा अन्य समाज विरोधी दुश्मनों से अफगानिस्तान की जनता को आखिरकैसे बचा सकती है? इस घटनाका सीधा सा अर्थ यही निकलता है कि पुलिस ऐसे हालात से निपटनेके लिए कतई सक्षम नहीं है।

                कुरान शरीफ को  जलाने अथवा इसके साथ बेअदबी करने के  हादसे तथा ऐसी घटनओं के विरुद्ध जनता का उन्माद पहले भीकई बार दुनिया के कई देशों में भड़कते हुए देखा जा चुका है। अफगानिस्तान में ही अमेरिका द्वारा संचालित बगराम जेल में 2012 में कुरान शरीफ के जलाए जाने की घटना ने अमेरिकी सेना के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी हिंसा का रूप धारण कर लिया था। पांच दिनों तक यह हिंसा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में फैली हुई थी। इस हिंसा में 30 लोग मारे गए थे। इसी प्रकार नवंबर 2014में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में लाहौर से 60 किलोमीटर की  दूरी परकोट राधा किशन नामक स्थान पर एक ईसाई दंपत्ति को मुसलमानों की उन्मादी भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डाला गया तथा बाद में उनकी लाशों को ईंट के  भट्टे में झोंककर जला दिया गया था। इस दंपत्ति पर भी यह आरोप था कि इसने कुरान शरीफ को जलाया तथा बाद में जले हुए कुरान के पन्नों को कूड़ेदान में फेंक दिया । हालांकि  इस मामले ने भी बाद में एक विवाद का रूप ले लिया था। ऐसी खबरें आईं थीं कि ईसाई दंपति पर कुरान शरीफ के अपमान का आरोप लगाने वाले एक मौलवी ने जानबूझ कर रंजिश के तहत ईसाई दंपत्ति पर ऐसा इल्ज़ाम लगाया था। यह घटनाएं ये सोचनेके लिए मजबूर करती हैं कि क्या धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने वाली उग्र भीड़ को यह अधिकार हासिल है कि वह जब चाहे किसी के भी विरुद्ध ऐसे गंभीर व संवेदनशील आरोप मढ़कर उसे सामूहिक हिंसा का निशाना बनाए? उसे पीट-पीट कर मार डाले और उसकी लाश को स्वयं आग के हवाले कर दे? यदि यह मान भी लिया जाए कि कुरान शरीफ का अपमान अथवा बेहुरमती करने वाले ऐसे अपराध करते भी रहे हैं तो भी क्या इस्लाम धर्म या इसकी शिक्षाएं इस बात की इजाज़त देती हैं कि कुरान शरीफ के साथ बदसलूकी करने वालों को किसी उग्र भीड़ द्वारा इसी प्रकार की कुर्र्ता पूर्ण  सज़ाएं दी जाएं?

                कभी ऐसी घटनाओं को लेकर तो कभी हज़रत मोहम्मद अथवा इस्लाम विरोधी कार्टूनों के प्रकाशन को लेकर मुसलमानों की इस प्रकार की  उग्र व उन्मादी भीड़ के सड़को पर उतरने व हिंसा पर उतारू होने ·ीअने· घटनाएं विश्व ·े विभिन्न देशों में होती रही हैं। ज़ाहिर है ऐसी सभी घटनाओं के पीछे मुसलमानों की कटरपंथी व रूढ़ीवादी सोच तथा ऐसी सोच का पोषण करने वाले धर्मगुरु शामिल रहते हैं। यही लोग अपनी तकऱीरों के द्वारा अपने वर्ग के  अनुयाईयों मेंआकरोष  भड़काते हैं। भले ही एसे धर्मगुरु यह क्यों न समझते हों कि वे इस प्रकार का उन्माद व उत्तेजना फैला·र तथा किन्हीं एक-दो व्यक्तियों पर ऐसे दोष मढ़कर उनके विरुद्ध भीड़ को हिंसा पर उतारू होने हेतु वरगलाकर अपने धर्म की सेवा कर रहे हों अथवा पुण्य लूट रहे हों या अपने लिए जन्नत जाने का मार्ग प्रशस्तकर रहे हों। परंतु वास्तव में इस प्रकार की हिंसक प्रतिक्रियाएं न केवल धर्म व इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध हैं बल्कि  इस प्रकार की हिंसक घटनाओं से इस्लाम धर्म कलंककित होता है। ऐसी ही  ज़हरीली सोच ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक द्वारा सिर्फ इस लिएकरा दी थी क्योंकि सलमान तासीर पाकिस्तान में लागू ईश निंदा कानून पर पुनर्विचार किए जाने के पक्षधर थे। इस घटना के बाद भी एक सवाल यह पैदा हुआ था कि मलिक  मुमताज़ हुसैन कादरी द्वारा सलमान तासीर का  अंगरक्षक होने के बावजूद उनकी हत्याकर देना कहां का धर्म है? क्या इस्लाम धर्म इस बात की इजाज़त देता है कि किसी के अंगरक्षक के रूप में उसकी सुरक्षा कादायित्व संभाल रहे व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने ही स्वामी की हत्या किए जाने जैसा घृणित अपराध किया जाए? और इससे अधिक अफसोसनाक यह कि कादरी द्वारा इस घिनौने अपराध को अंजाम देने के बाद पाकिस्तान की अदालत में पेशीके समय उसी हत्यारे पर फूल बरसाए गए तथा उसका कट्टरवादी मुस्लिम समाज द्वारा जिनमें तमाम वकील भी शामिल थे, ज़ोरदार स्वागत किया
ऐसी घटनओं को रोकने के लिए विश्वस्तर पर मुस्लिम धर्मगुरुओं के संगठित होने तथा ऐसे उन्मादको रोकने हेतु अपने-अपने अनुयाईयों को  नियंत्रित करने व उन्हें सहनशीलता का  पाठ पढ़ाए जाने की बहुत सख्त ज़रूरत है। यदि कहीं इस प्रका र का  ईश निंदा संबंधी अपराध होता भी है तो स्थानीय न्याय व्यवस्था तथा स्थानीय शासन व प्रशासन पर भरोसा करते हुए संबंधित घटना से कानूनी तौर पर निपटने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से कुरान शरीफ इस्लाम  का सबसे पवित्र व सम्मानित धर्म ग्रंथ है। इसका अपमान मुसलमानों में स्वभाविक रूप से ग़ुस्सा पैदा कर सकता है। परंतु यही इस्लाम धर्म और यहीकुरान शरीफ मानवता का पाठ भी पढ़ाता है। निहत्थे पर ज़ुल्म  करने से भी रोकता है। महिलाओं पर अत्याचार करना या किसी के शव को जलाया जाना या उसे जि़ंदा जला दिया जाना इस्लामी शिक्षा  का हिस्सा कतई नहीं है। न ही ऐसे घृणित अपराध अंजाम देकर दुनिया  का कोई भी धर्मगुरु या कोई मुसलमान जन्नत में जाने या पुण्य ·मानने का दावा कर सकता है। ऐसे कृत्य पूरी तरह से इस्लाम विरोधी व मानवता विरोधी हैं।
  -तनवीर जाफरी

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

फर्जी डिग्री : डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय .

मंगलवार, 31 मार्च 2015



किसी राष्ट्र के बौद्धिक स्तर का आकलन वहां की शिक्षा व्यवस्था के स्तर पर निर्भर करती हैं। शिक्षा का पतन किसी भी राष्ट्र के पतन का द्योतक होता है और जब शिक्षा के कर्णधार ही क्षुद्र स्वार्थवश शिक्षा की नैया डुबोने लग जायें तो शिक्षा और राष्ट्र को पूरी तरह से रामभरोसे ही समझना चाहिए। व्यावसायिकता की मानसिकता का यह चरम बिन्दु है जब व्यक्ति ने सब कुछ व्यावसायिक ही समझ लिया है। वर्तमान समय में शिक्षा की व्यवसायिकता को देखते हुए यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि विद्या मन्दिर धन उगाही और शोषण के अड्डे बन गए हैं। जहां अयोग्य शिक्षितों की फौज तैयार की जा रही है। इन विद्या मन्दिरों द्वारा भारत के जिस युवा भविष्य का निर्माण किया जा रहा है वह भार साबित होगा और आज की थकी मांदी कानून व्यवस्था, खूंखार राजनीतिक व्यवस्था, नपुंसक नौकरशाही और शिक्षा के सामन्ती जिम्मेदारान; इन चारों की चैकड़ी ने शिक्षा को ऐेसे गर्त की ओर धकेल दिया है जिसके आगे अंधकार के सिवा कुछ नहीं है। यह अभी सबकी आंखो को नहीं दिखायी देता क्योंकि उन पर स्वार्थ, अज्ञानता, कूपमण्डूकता, उदासीनता इत्यादि का पर्दा पड़ा हुआ है। हकीकत यह है कि यह शिक्षा की वह भयावह स्थिति है जो आने वाली पीढ़ी की मानसिक विकलांगता इस स्तर तक बिगाड़ देगी जिसे सुधारने में सदियां शहीद हो जाएंगी। स्थिति बन्दूक से निकली गोली की हो जाय इससे पहले देश की शिक्षा के कर्णधार शिक्षा को लेकर सचेत हो जायं और दृढ़निष्ठ कर्तव्य में लग जायं।
    बात डाॅ0 राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों की है। गत दशक में महाविद्यालय कुकुरमुत्तों के अनुपात में उगे और शिक्षा को भी कुकुरमुत्ते के स्तर तक पहुँचाने में समूचे खानदान के साथ जुट गये। मान्यताएं मिलती गयीं और महाविद्यालय बढ़ते रहे। इन्ही के साथ रोपित भ्रष्टाचार भी बढता रहा। शिक्षा के मालवीयों का असंख्य संख्या में अवतार हुआ। जिन्होने अपने अपने अनुसार शिक्षा का पिण्डदान किया। शिक्षा मन्दिर के महन्तों ने शिक्षा को मन्दिर से निकालकर बाजार में लाकर खड़ा कर दिया। यह सब किसी एक के द्वारा या अचानक नहीं हुआ। इसकी जड़ भी है और उसके नाश की दवा भी। इन महाविद्यालयों का शासनादेश से छत्तीस का सम्बन्ध होता है। स्ववित्तपोषित वित्तशोषित होते जा रहे हैं। महाविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रत्यक्ष प्रकट है। बड़ा ही दुखद आश्चर्य होता है कि यह सब साक्षात होता देखकर राजनीति और प्रशासन दोनो ही मौन है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या कहा जा सकता है।
    स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों को संचालित करने हेतु समय समय पर विभिन्न शासनादेश जारी होते रहे हैं जो निश्चित ही स्वागत योग्य हैं। छात्रों की संख्या में जिस अनुपात में वृद्धि हूई उस अनुपात में महाविद्यालय खोल पाना सरकार के वश में नही था या फिर उन्होनंे कोशिश नहीं की। फलतः स्ववित्तपोषित व्यवस्था अस्तित्व में आयी। इसके शासनादेशों में महाविद्यालय के मानकों का निर्धारण किया गया, जिसका दुरूपयोग ज्यादा हुआ सदुपयोग बहुत कम। शोषण अभिभावक, प्राध्यापक और सरकारी अनुदानो का हुआ। 
    महाविद्यालय में प्राध्यापक पद पर नियुक्ति की अपनी योग्यताएं हैं। योग्य प्राध्यापक की नियुक्ति के आधार पर विश्वविद्यालय सम्बन्धित महाविद्यालय को विषय का आवंटन, मान्यता आदि प्रदान करता है। आज यह सिस्टम आम हो गया है कि अभ्यर्थी के कागजात लेकर अनुमोदन तो करवा लिये जाते हैं लेकिन उन्हे पढ़ाने के लिए नही बुलाया जाता। वे कहीं अलग पढ़ाते है और अनुमोदन भी एकाधिक काॅलेजों से चलता रहता है। काॅलेज में अनुमोदित प्राध्यापक के स्थान पर अन्य लोग पढ़ाते है जो सामान्यतः नाॅनक्वालीफाइड होते हैं। एक अभ्यर्थी का अनुमोदन एकाधिक काॅलेज से होना अपराध है। जबकि व्यवहार में यह आम है। इसमें कभी कभी दोनो पक्ष की सहमति होती है और कभी कभी इस अपराध की जानकारी उस अभ्यर्थी को नहीं होती जिसका अनुमोदन उसकी बगैर जानकारी के हो जाता है। हद तो तब हो जाती है जब विश्वविद्यालय यह सब जानकार मौन बना रहता है और कोई कार्रवाई नही करता। इससे भ्रष्टाचार को शह मिलती है। शायद ही ऐसा कोई महाविद्यालय हो जहां पर समस्त अनुमोदित प्राध्यापक अध्यापन करते हैं।
प्राध्यापकोें के वेतन भुगतान का शासनादेश व्यावहारिक न होने से वह प्रबन्ध तंत्र का हथियार बन गया है जिसका प्रहार प्राध्यापक झेलता है। शासनादेश में पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत तक वेतन मद में खर्च करने का प्रावधान है। जिसे कोई भी समझदार या गैर समझदार उचित नही कह सकता है। शासनादेश के अनुपालन में गिने चुने नाम मात्र महाविद्यालयों में प्राध्यापकों को मानक के अनुकूल वेतन मिलता होगा। सर्वाधिक संख्या ऐसे काॅलेजों की मिलेगी जहां के प्राध्यापको को मानकानुकूल वेतन नहीं मिलता (कहीं कहीं खाते पर भी नहीं दिया जाता)।सी0पी0कटौती तो गधे के सर की सींग ही समझिये। वेतन सम्बन्धी शासनादेश की पंगुता ने प्रबन्ध को मनमाना वेतन देने के लिए निरंकुश छोड़ दिया है और इसका खामियाजा वह शिक्षक पीढ़ी भुगत रही है जो उसे लेने को अभिशप्त है।
प्राध्यापक के निष्कासन से सम्बन्धित भी शासनादेश है। इस शासनादेश में कुछ त्रुटियां भी हैं। जैसे अनुमोदित प्राध्यापक का हर तीसरे या पांचवे साल नवीनीकरण कराना। एक तरह से टीचर को ठेके पर नियुक्ति देने जैसा है। नियमतः प्राध्यापक का निष्कासन विश्वविद्यालय द्वारा होना चाहिए लेकिन देखा यही गया है कि वह महाविद्यालय में विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त समय तक के लिए नही अपितंु प्रबन्ध समिति की मर्जी तक होता है। प्राध्यापक अस्थिरता के अवसाद से ग्रसित होता रहता है। 
निरंतर और भयंकर होती जाती नकल प्रथा के विषदन्त ने शायद ही किसी स्ववित्तपोषित काॅलेज पर निशान न छोड़े हों। जिस तरह से आज शिक्षा के तथाकथित मालवीयों ने नकल को महाविद्यालयों का मानक बना लिया है। शिक्षा मन्त्री के काॅलेज से सामूहिक नकल पकड़ी जाती है। जो महाविद्यालय जितना ही अधिक नकल करा सकता है वह उतना ही अधिक छात्रों के एडवीसन पाता है। छात्र आकर एडमीशन कराता है फिर प्रवेश पत्र लेने आता है (अगर कोई परिचित काॅलेज मे हुआ तो वह भी घर ही पहुंच गया) और फिर परीक्षा देने। इसी प्रकार मात्र कुछ दिन आकर वह स्नातक और परास्नातक की डिग्री पा जाता है। ऐसे सिर्फ परीक्षा के दिनों आने वाले छात्रों की संख्या कोई कम नहीं है। जब उसी काॅलेज के बच्चे उसी काॅलेज में परीक्षा देंगे तो परीक्षा कैसे होगी ये तो सब जानते हैं।
तमाम काॅलेज ऐसे भी है जहां के पुस्तकालयों में दरिद्रता का साकार रूप दिखायी पड़ता है। एक तो छात्र की पढ़ने में रूचि की कमी है दूसरे पुस्तकालय के नाम पर खाना पूर्ती। पाठ्यक्रम की तो पुस्तकें शायद मिल जाएंगी लेकिन पत्र पत्रिकाएं पाठ्यक्रम से सम्बघित अन्य उपयोगी पुस्तको का दर्शन तो शायद ही मिले। पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति में भी प्राध्यापक नियुक्ति जैसी खामियां है जो प्रबन्ध समिति को मनमाना करने को प्रेरित करती है।
बहुत काॅलेजो में क्लर्को की संख्या बहुत कम देखी जाती है। क्लर्को का आभाव, छात्रों की अधिक संख्या के कारण प्राध्यापको उन कागजों को निपटाता है। तमाम प्रबन्ध समिति का व्यवहार प्राध्यापकों के प्रति तानाशाही जैसा होता है। वे प्राध्यापकों पर मिलिट्री जैसा अनुशासन रखना चाहते हैं और तमाम रखते भी हैं। टीचर टीचर न रहकर बाबू बन जाता है।
ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षा के इन स्ववित्तपोषित संस्थानों की यह बीमारी लाइलाज है। चूँकि बीमारी का कारण है तो इसका समाधान भी है। पहली समस्या प्राध्यापकों के एकाधिक काॅलेजो के अनुमोदन की है जिसके कारण एक टीचर का अनुमोदन अनेक काॅलेजो से चलता रहता है और विश्वविद्यालय को गलत जानकारी देकर महाविद्यालयों को संचालित किया जाता है। वेतन भुगतान आदि की प्रक्रिया भी घपले में चलती रहती है। ऐसे में विश्वविद्यालय का यह दायित्व अपरिहार्य हो जाता है कि वह प्राध्यापक के अनुमोदन सम्बन्धी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाते हुए अनुमोदित प्राध्यापकों का विवरण आॅनलाइन करे। प्रदेश स्तर पर प्राध्यापको का अनुमोदन आॅनलाइन हो जाने से एक प्राध्यापक का अनुमोदन एक ही काॅलेज से होगा जिससे योग्य प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन सम्भव हो सकेगा। आॅनलाइन हो जाने से प्राध्यापक भी उसी काॅलेज मे अध्यापन कर सकेगा जहां से उसका अनुमोदन चल रहा है। महाविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में विश्वविद्यालय को यह कदम अबिलम्ब उठाना होगा और यहीं से भ्रष्टाचार निवारण की ठोस शुरुवात करनी होगी।
प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान हेतु स्पष्ट शासनादेश है कि शुल्क के रुप में प्राप्त आय का पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत वेतन मद में खर्च किया जाएगा। अधिकांश महाविद्यालय ऐसे राजनीतिज्ञों के है जिनका सत्ता और राजनीति में काफी दखल होता है। लाखों करोड़ो रूपये खर्च करके महाविद्यालय अगर इतना रूपया वेतन मद में खर्च कर देेंगे तब तो वो फुटपाथ पर आ जाएंगे। आज शिक्षालय खोलना समाज सेवा नही है यह अर्थोपार्जन का माध्यम है। आज यह कहते आसानी से सुना जा सकता है कि आज के समय में सबसे बढि़या धन्धा स्कूल खोलना है। यह सही भी है आज पता नही कितने पूंजीपतियो ने राजनीतिज्ञों ने अपनी काली कमाई से स्कूल खोलकर अपने काले धन को गोरा बना लिया है। ऐसे में उनसे पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत  वेतन मद में खर्च करने की अपेक्षा करना हास्यास्पद है। शासन को चाहिए कि वेतन सम्बन्घी शासनादेश को व्यवहारिक रूप दे। फीस के रूप में प्राप्त आय से वेतन का निर्धारण न करके न्यूनतम वेतनमान की व्यवस्था करे। शासनादेश के अनुपालन में वेतन भुगतान खाते से देना अनिवार्य करे। चूकि भविष्य केवल सरकारी प्राध्यापकों का ही नही होता है आज की महंगायी में नाम मात्र वेतन पर गुजारा करने वाले योग्य प्राध्यापकों का भी होता है। अतः सी0पी0एफ0 कटौती को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।
प्राध्यापक के निष्कासन से सम्बन्धित शासनादेश व्यवहारिक है लेकिन  व्यवहार मे लाया नहीं जाता। वैसे तो प्राध्यापक का निष्कासन विश्वविद्यालय की संस्तुति से ही होता है लेकिन हकीकत यह है कि काॅलेज मे प्राध्यापक प्रबन्ध समिति की मर्जी तक कार्य कर सकता है। वह जब चाहे तब उसे हटा सकता है। ऐसे में प्राध्यापक अस्थिरता और पराधीनता की मानसिकता में जीता है। जब सरकारी प्राध्यापक और स्ववित्तपोषित प्राध्यापक की योग्यता समान रखी गयी है, कार्य समान रखा गया है तो अगर समान वेतन नही दे सकते तो नियुक्ति को तो स्थायी करने का पक्ष बनता ही है। प्राध्यापको का अनुमोदन स्थायी किया जाय या उन्हे अनुमोदन पत्र की जगह नियुक्ति पत्र दिया जाय। निश्चित अवधि पर नवीनीकरण करवाते रहने से पता क्या हित शासन, या विश्वविद्यालय का है यह समझ में नही आता। लगता है कि यह नियम प्राध्यापकों के मानसिक शोषण और उसकी पराधीनता को बनाये रखने के लिए बनाया गया है।
इन महाविद्यालयों में व्याप्त नकल व्यवस्था एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसका स्थायी समाधान अबिलम्ब खोजा जाना अति आवश्यक है। जब शिक्षालयों के संचालक नकल कराने को परम ध्येेय मान बैठे हों तब इसके विषय में सहज ही समझा जा सकता है। वर्तमान परीक्षा प्रणाली नकल को रोकने में सक्षम नही हो सकती। जब उसी काॅलेज के छात्र उसी काॅलेज मे परीक्षा देंगे तो नकल तो करेंगे ही। विश्वविद्यालय प्रशासन को चाहिए कि नकल रोकने के लिए ठोस कदम उठाये। इस क्रम में सबसे पहला कदम यह उठाना होगा कि परीक्षा केन्द्रो को स्थायी न किया जाय। ऐसा करके ही काफी हद तक तक परीक्षा की सुचिता और पवित्रता बनायी रखी जा सकती है। 
पुस्तकालय, पुस्तकालयाध्यक्ष आदि के सम्बन्ध को विश्वविद्यालय को चाहिए कि वह महाविद्यालयो में मानको के औचक निरीक्षण की पारदर्शिता पूर्ण व्यवस्था करें। मानक पूरे न करने की दशा में विश्वविद्यालय द्वारा तुरन्त वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए। क्लर्को की संख्या भी मानकानुकूल होना चाहिए।
विश्वास नही होता कि यह भ्रष्टाचार विश्वविद्यालय और प्रशासन की जानकारी में नही है। अगर जानकारी मे होने के बावजूद इस पर आज तक कोई ठोस कदम नही उठाया गया तो इसका क्या कारण हो सकता है यह आज के बुद्धिजीवियों के लिए चिन्तन से ज्यादाा चिंता का विषय है। और अगर इतना प्रत्यक्ष और विकराल भ्रष्टाचार उसके संज्ञान में नही है तो शिक्षा के जिम्मेदार अपनी कुर्सी पर बैठे रहने के योग्य नहीं हैं। जब ऐसे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाले ही अंधे, बहरे, गूंगे की भूमिका निभाएंगे तो अदम जी की ये पंक्तियां ही रास्ता तलाशने पर विवश होंगी-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत, ये बात कह रहा हूँ मै होशो हवाश में।
---------------डॉ.अनिल कुमार  सिंह 
 

सोमवार, 30 मार्च 2015

हरयाणा नंबर वन कोन्या

हरयाणा नंबर वन कोन्या 
फोर लेन और मॉल म्हारा चेहरा खूब चमकाया रै
लिंग अनुपात अनीमिया नै महारै कालस लगायारै
दो छोर म्हारे हरयाने के नहीं मेरी समझ मैं आवैं 
एक कान्ही सबते बढ़िया  कार हरियानावासी बनावैं 
महिला भ्रूण हत्या करकै  सबतैं  तेज कार चलावैं 
गर्भ वती महिला खून कमी जापे के माह मरजयावैं 
सोच सोच कै  इन बातां नै दिमाग मेरा चकराया रै|
आर्थिक विकास घना सामाजिक विकास थोडा बताते
विकास मॉडल मै मोजूद कमी नहीं खोल कै दिखाते
सचाई नै आंकडों  बीच कई बुद्धिजीवी बी छिपाते
म्हारे नेता बी सचाई तै बहोत घना आज घबराते
पांचो घी मैं जिसकी सैं  हरियाणा नंबर वन भाया रै|
आर्थिक विकास की माया देखो पैसा छाया चारो और
नंबर वन हरियाणा का मचाया चारो कान्ही शोर
धरती बिकती जा म्हारी औरों  के बिक़े डांगर ढोर
शाह नै मात देवैं  ये समाज सेवी बनकै  ठग चोर
चोर दवारा साह खुले के मैं जाता रोजाना धमकाया रै|
कई बार सोचूँ लोट खाट मैं आज हुआ किसा विकास यो
दिमाग भन्नाया सै मेरा सोचै कदे होरया हो विनास यो
ठेकेदारी का बोलबाला सै करता म्हारा उपहास यो
विकास हुआ या विनास हिल गया मेरा विश्वास यो
रणबीर बरोने वाला ना इनकी बहका मैं आया रै |।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

LOK SANGHRASH
Posted: 23 Mar 2015 06:04 AM PDT
भाग.1
उच्च जातियों के हिन्दुओं और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का गाय के प्रति . एक पशु बतौर व हिन्दू राष्ट्र के प्रतीक बतौर . ढुलमुल रवैया रहा है। कभी वे गाय के प्रति बहुत श्रद्धावान हो जाते हैं तो कभी उनकी श्रद्धा अचानक अदृश्य हो जाती है। हाल के कुछ वर्षों में, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय को एक पवित्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। और यह इसलिए नहीं कि सनातन धर्म की चमत्कृत कर देने वाली विविधता से परिपूर्ण धार्मिक.दार्शनिक ग्रंथ ऐसा कहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि गाय, हिन्दुओं को लामबंद करने और मुसलमानों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐसा क्यों ? क्योंकि मुसलमानों के गौमांस भक्षण पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है और इस धर्म के मानने वालों का एक तबका मांस व मवेशियों के व्यापार में रत है। मुस्लिम शासकों और धार्मिक नेताओं का भी गाय के प्रति ढुलमुल रवैया रहा है। कभी उन्होंने हिन्दुओं के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की खातिर गौवध को प्रतिबंधित किया तो कभी अपने सांस्कृतिक अधिकारों और अपनी अलग पहचान पर जोर दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर डीएन झा की पुस्तक 'द मिथ ऑफ होली काऊ' ;पवित्र गाय का मिथक कहती है कि प्राचीन भारत में न केवल गौमांस भक्षण आम था वरन् गाय की बलि भी दी जाती थी और कई अनुष्ठानों में गाय की बलि देना आवश्यक माना जाता था। कई ग्रंथों में इन्द्र भगवान द्वारा बलि दी गई गायों का मांस खाने की चर्चा है। चूंकि उस समय समाज, घुमंतु से कृषि.आधारित बन रहा था इसलिए मवेशियों का महत्व बढ़ता जा रहा थाए विशेषकर बैलों और गायों का। मवेशी, संपत्ति के रूप में देखे जाने लगे थे जैसा कि 'गोधन'शब्द से जाहिर है। शायद इसलिएए गाय की बलि पर प्रतिबंध लगाया गया और उस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए उसे धार्मिक चोला पहना दिया गया। सातवीं से पांचवी सदी ईसा पूर्व के बीच लिखे गए ब्राह्मण ग्रंथों, जो कि वेदों पर टीकाएं हैं, में पहली बार गाय को पूज्यनीय बताया गया है। 
इसके बाद, भारत में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ और सम्राट अशोक ने सभी पशुओं के प्रति दयाभाव को अपने राज्य की नीति का अंग बनाया। यहां तक कि उन्होंने जानवरों की चिकित्सा का प्रबंध तक किया और उनकी बलि पर प्रतिबंध लगा दिया, यद्यपि यह प्रतिबंध मवेशियों पर लागू नहीं था। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में मवेशियों के वध को आम बताया गया है। इंडोनेशिया के बाली द्वीपसमूह के हिन्दू आज भी गौमांस खाते हैं। कुछ आदिवासी समुदायों में आज भी उत्सवों पर गाय की बलि चढ़ाई जाती है। कुछ दलित समुदायों को भी गौमांस से परहेज नहीं है। हिन्दुओं के गौमांस भक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध, आठवीं सदी ईस्वी में लगाया गया,जब आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन का समाज में प्रभाव बढ़ा। बौद्ध धर्म.विरोधी प्रचार भी आठवीं सदी में अपने चरम पर पहुंचाए जब शंकर ने अपने मठों का ढांचा, बौद्ध संघों की तर्ज पर बनाया। ग्यारहवीं सदी तक उत्तर भारत में हिन्दू धर्म एक बार फिर छा गया, जैसा कि उस काल में रचित संस्कृत नाटक 'प्रबोधचन्द्रोदय' से स्पष्ट है। इस नाटक में बौद्ध और जैन धर्म की हार का रूपक और विष्णु की आराधना है। तब तक उत्तर भारत के अधिकांश रहवासी शैव, वैष्णव या शक्त बन गए थे। 12वीं सदी के आते.आते, बौद्ध धर्मावलंबी केवल बौद्ध मठों तक सीमित रह गए और आगे चलकरए यद्यपि बौद्ध धर्म ने भारत के कृषक वर्ग के एक तबके को अपने प्रभाव में लिया, तथापि, तब तक बौद्ध धर्म एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय के रूप में अपनी पहचान खो चुका था। वैष्णव, पशुबलि के विरोधी और शाकाहारी थे।
मुसलमानों का ढुलमुल रवैया
    मुस्लिम शासक और धार्मिक नेता, वर्चस्वशाली उच्च जाति के हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करने और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर जोर देने के बीच झूलते रहे। मुगल बादशाह बाबर ने गौवध पर प्रतिबंध लगाया था और अपनी वसीयत में अपने पुत्र हुमांयू से भी इस प्रतिबंध को जारी रखने को कहा था। कम से कम तीन अन्य मुगल बादशाहों.अकबर, जहांगीर और अहमद शाह.ने भी गौवध प्रतिबंधित किया था। मैसूर के नवाब हैदरअली के राज्य में गौवध करने वाले के हाथ काट दिए जाते थे। असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के दौरान गौवध लगभग बंद हो गया था क्योंकि कई मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस आशय के फतवे जारी किए थे और अली बंधुओं ने गौमांस भक्षण के विरूद्ध अभियान चलाया था। महात्मा गांधी ने हिन्दुओं से खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने की जो अपील की थी, उसके पीछे एक कारण यह भी था कि इसके बदले  मुसलमान नेता गौमांस भक्षण के विरूद्ध प्रचार करेंगे। मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस अहसान का बदला चुकाया और गौवध के खिलाफ अभियान शुरू किया। इससे देश में अभूतपूर्व हिन्दू.मुस्लिम एकता स्थापित हुई और पूरे देश ने एक होकर अहिंसक रास्ते से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मोर्चा संभाला।
हाल में कई राज्यो द्वारा गौवध पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून बनाए गए हैं। इनका विरोध गौमांस व्यापारी  व मांस उद्योग के श्रमिक कर रहे हैं। इनमें मुख्यतः कुरैशी मुसलमान हैं परंतु हिन्दू खटीक व अन्य गैर.मुसलमान भी यह व्यवसाय करते हैं। वे इस प्रतिबंध का विरोध मुख्यतः इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा। फिक्की और सीआईआई यह चाहते हैं कि उद्योगों और व्यवसायों पर सरकार का नियंत्रण कम से कम हो। अगर ये छोटे व्यवसायी भी ऐसा ही चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है ? और यहां इस तथ्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि मांस के व्यवसायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल हैं परंतु मीडिया केवल मुसलमानों के विरोध को महत्व दे रहा है और गैर.मुसलमानों द्वारा किए जा रहे विरोध का अपेक्षित प्रचार नहीं हो रहा है। गौवध पर प्रतिबंध और गौमांस के व्यवसाय के विनियमन को कई आधारों पर चुनौती दी जाती रही है, जिनमें से एक है संविधान के अनुच्छेद 19;1 द्वारा हर नागरिक को प्रदत्त 'कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार' करने का मौलिक अधिकार। इसके अतिरिक्तए अनुच्छेद 25, जो कि सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता देता है,के आधार पर भी इस प्रतिबंध को अनुचित बताया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रतिबंध को इस आधार पर उचित ठहराया है कि यह जनहित ;दुधारू व भारवाही पशुओं और पशुधन का संरक्षण,में है और यह व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर अनुचित प्रतिबंध नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के आधार पर चुनौती को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यद्यपि इस्लाम में गौमांस भक्षण की इजाजत है तथापि मुसलमानों के लिए गौमांस भक्षण अनिवार्य नहीं है।
गौवध संबंधी पुराने कानूनों का चरित्र मुख्यतः नियामक था और उनमें गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था। इन कानूनों में गायों और दोनों लिंगों के बछड़ों के वध को प्रतिबंधित किया गया था परंतु राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकृत अधिकारी की इजाजत से, एक निश्चित आयु से ज्यादा के पशुओं का वध किया जा सकता था। इन कानूनों को शाकाहार.समर्थक नागरिकों ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि वे राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक, जिसमें'गायों,बछड़ों व अन्य दुधारू व भारवाही पशुओं के वध पर प्रतिबंध' लगाए जाने की बात कही गई है, का उल्लंघन हैं। उच्चतम न्यायालय ने मोहम्मद हमीद कुरैशी विरूद्ध बिहार राज्य प्रकरण में इस तर्क को इस आधार पर खारिज कर दिया कि एक निश्चित आयु के बाद, गौवंश की भारवाही पशु के रूप में उपयोगिता समाप्त हो जाती है और वे सीमित मात्रा में उपलब्ध चारे पर बोझ बन जाते हैं। अगर ये अनुपयोगी जानवर न रहें तो वह चारा दुधारू व भारवाही पशुओं को उपलब्ध हो सकता है। राज्यों ने अनुपयोगी हो चुके गौवंश के संरक्षण के लिए जो गौसदन बनाए थे, वे घोर अपर्याप्त थे। इस संबंध में दस्तावेजी सुबूतों के आधार पर न्यायालय ने कहा कि गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता और वह जनहित में नहीं है।
परंतु दूसरे दौर के गौवध.निषेध कानूनों में गौवध पर प्रतिबंध तो लगाया ही गया साथ ही,गौमांस खरीदने व उसका भक्षण करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान कर दिया गया। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बनाया गया कानून तो यहां तक कहता है कि गौमांस भंडारण करने व उसे पकाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान, जिनमें फ्रिज और बर्तन तक शामिल हैं, को भी जब्त किया जा सकता है। अर्थात अब पुलिसवाला हमारे रसोईघर में घुस सकता है और अगर वहां गौमांस पाया गया या उसके भंडारण या पकाने का इंतजाम मिला,तो हमें जेल की सलाखों के पीछे सात साल काटने पड़ सकते हैं।  
गौवध व हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन
    गौवध के संबंध में जिस तरह का ढुलमुल रवैया हिन्दू व मुस्लिम धार्मिक व राजनैतिक नेताओं का था,कुछ वैसा ही हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का भी रहा है। हिन्दुत्व चिंतक वी. डी. सावरकर ने गाय को श्रद्धा का पात्र बनाने का विरोध किया था। उनका कहना था कि गाय एक पशु है, हमें उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और हिन्दुओं को करूणा व दयावश उसकी रक्षा करनी चाहिए। परंतु उनके लिए गाय किसी भी अन्य पशु के समान थी.न कम न ज्यादा। वे लिखते हैं 'गाय और भैंस जैसे पशु और पीपल व बरगद जैसे वृक्ष, मानव के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें पसंद करते हैं और यहां तक कि हम उन्हें पूजा करने के काबिल मानते हैं और उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है परंतु केवल इसी अर्थ में। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अगर किन्हीं परिस्थितियों मेंए वह जानवर या वृक्ष मानवता के लिए समस्या का स्त्रोत बन जाए तब वह संरक्षण के काबिल नहीं रहेगा और उसे नष्ट करना,मानव व राष्ट्र हित में होगा और तब वह मानवीय व राष्ट्र धर्म बन जाएगा';समाज चित्र, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 678। सावरकर आगे लिखते हैं 'कोई भी खाद्य पदार्थ इसलिए खाने योग्य होता है क्योंकि वह हमारे लिए लाभदायक होता है परंतु किसी खाद्य पदार्थ को धर्म से जोड़ना, उसे ईश्वरीय दर्जा देना है। इस तरह की अंधविश्वासी मानसिकता से देश की बौद्धिकता नष्ट होती है' ;1935, सावरकरांच्या गोष्ठी, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 559 द्। 'जब गाय से मानवीय हितों की पूर्ति न होती हो या उससे मानवता शर्मसार होती हो,तब अतिवादी गौसंरक्षण को खारिज कर दिया जाना चाहिए' ;समग्र सावरकर वांग्मय,खण्ड 3, पृष्ठ 341,।'मैंने गाय की पूजा से जुड़े झूठे विचारों की निंदा इसलिए की ताकि गेंहू को भूंसे से अलग किया जा सके और गाय का संरक्षण बेहतर ढंग से हो सके';1938,स्वातंत्रय वीर सावरकर, हिन्दू महासभा पर्व,पृष्ठ 143।
खिलाफत आंदोलन के दौरान, जब मुसलमानों ने गौमांस भक्षण बंद कर दिया और गौवध का विरोध करने लगे तब सावरकर और हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गाय वह मुद्दा न रही जिसका इस्तेमाल हिन्दुओं को एक करने और मुसलमानों को 'दूसरा' या 'अलग' बताने के लिए किया जा सके। परंतु सावरकर हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने का विरोध एक अन्य कारण से भी कर रहे थे। सावरकर लिखते हैंए 'जिस वस्तु की हम पूजा करें, वह हमसे बेहतर व महान होनी चाहिए। उसी तरहए राष्ट्र का प्रतीक, राष्ट्र की वीरता, मेधा और महत्वाकांक्षा को जागृत करने वाला होना चाहिए और उसमें देश के निवासियों को महामानव बनाने की क्षमता होनी चाहिए। परंतु गाय, जिसका मनमाना शोषण होता है और जिसे लोग जब चाहे मारकर खा लेते हैं, वह तो हमारी वर्तमान कमजोर स्थिति का एकदम उपयुक्त प्रतीक है। पर कम से कम कल के हिन्दू राष्ट्र के निवासियों का तो ऐसा शर्मनाक प्रतीक नहीं होना चाहिए' ;1936, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 3ए पृष्ठ 237। 'हिन्दुत्व का प्रतीक गाय नहीं बल्कि नृसिंह है। ईश्वर के गुण उसके आराधक में आ जाते हैं। गाय को ईश्वरीय मानकर उसकी पूजा करने से संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र गाय जैसा दब्बू बन जाएगाए वह घास खाने लगेगा। अगर हमें अपने राष्ट्र से किसी पशु को जोड़ना ही है तो वह पशु सिंह होना चाहिए। एक लंबी छलांग लगाकर सिंह अपने पैने पंजों से जंगली हाथियों के सिर को चीर डालता है। हमें ऐसे नृसिंह की पूजा करनी चाहिए। नृसिंह के पैने पंजे न कि गाय के खुर, हिन्दुत्व की निशानी हैं, ;1935, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मयए खण्ड 3,पृष्ठ 167। सावरकर की मान्यता थी कि हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने से वे जरूरत से ज्यादा विनम्र, दयालु व सभी प्राणियों को समान मानने वाले बन जाएंगे। जबकि सावरकर तो राष्ट्रवाद का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण करना चाहते थे।
-इरफान इंजीनियर
 

रविवार, 15 मार्च 2015

राजनीति की बिसात पर पवित्र गाय का मांस

Posted: 13 Mar 2015 06:05 AM PDT
क्या समाज के किसी वर्ग की खानपान की आदतों को राजनीति का विषय बनाया जा सकता है ? क्या कोई पशु, जिसे  समाज का एक तबका, माता की तरह पूजता हो, राजनीति की बिसात का मोहरा बन सकता है? यद्यपि यह अकल्पनीय लगता है परंतु यह सच है कि गाय, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा  पारित ';महाराष्ट्र पशु संरक्षण ;संशोधन  विधेयक 1995'; को हाल में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई। इस नए कानून के अंतर्गत, गाय के अलावा बैलों का वध भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस कानून का उल्लंघन करने वालों को पांच साल तक की कैद और 10 हजार रूपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा। जब मैंने विधेयक के शीर्षक में शामिल';पशु संरक्षण'; शब्दों को पढ़ा तो मुझे लगा कि यह उन सभी पशुओं के बारे में होगा, जिनका भक्षण मानव करते हैं और या फिर यह समाज द्वारा जानवरों के विभिन्न गतिविधियों में इस्तेमाल से संबंधित होगा। परंतु आगे पढ़ने पर मुझे यह ज्ञात हुआ कि यह कानून केवल गौवंश पर लागू होगा। लगभग एक दशक पहले, मुझे यह पढ़कर बहुत धक्का लगा था कि प्राचीन भारतीय इतिहास के अनन्य अध्येता प्रोफेसर द्विजेन्द्र नाथ झा को फोन पर कई लोगों ने यह धमकी दी कि अगर उन्होंने उनकी पुस्तक ';होली काउ बीफ इन इंडियन डायटरी ट्रेडिशन'; ;भारतीय खानपान परंपरा में पवित्र गाय का मांस को प्रकाशित किया तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह विद्वतापूर्ण पुस्तक,भारतीय खानपान में गौमांस भक्षण की सदियों पुरानी परंपरा पर केन्द्रित है।
जाहिर है कि नए कानून का उद्धेश्य गौमांस भक्षण और गौवध के बहाने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना है। सन्  2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान जो कई नारे उछाले गए थे उनमें से दो थे, ';मोदी को मतदान, गाय को जीवनदान'; और';बीजेपी का संदेश, बचेगी गायए बचेगा देश';। ये नारे भाजपा के ';गौ विकास प्रकोष्ठ'; द्वारा गढ़े गए थे।
धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति में इस तरह के भावनात्मक व पहचान से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल आम है। हम सब जानते हैं कि किस प्रकार भाजपा ने पहचान से जुड़े एक अन्य मुद्दे.राममंदिर.का इस्तेमाल कर अपनी राजनैतिक ताकत बढ़ाई थी। गाय,लंबे समय से संघ.भाजपा की राजनीति का हिस्सा रही है। गौवध के मुद्दे पर सैकड़ों दंगे भड़काए गए हैं। सन् 1964 में आरएसएस द्वारा विश्व हिन्दू परिषद के गठन के बाद से, योजनाबद्ध तरीके से गाय का मुद्दा समय.समय पर उठाया जाता रहा है। गाय और गौमांस भक्षण के संबंध में कई गलत धारणाएं प्रचारित की जाती रही हैं। गौमांस भक्षण को मुस्लिम समुदाय से जोड़ना, इनमें से एक है। मुसलमानों के एक वर्ग ';कसाईयों'; को घृणा का पात्र बना दिया गया है। इस तरह की बातें कही जाती रही हैं जिनसे यह भ्रम होता है कि गौमांस भक्षण, मुसलमानों के लिए अनिवार्य है। समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा पैठ कर गई है कि चूंकि गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र है इसलिए मुसलमान उसका वध करते हैं। यह भी कहा जाता है कि गौमांस भक्षण की परंपरा भारत में मुस्लिम आक्रांताओं ने स्थापित की। ये सभी धारणाएं तथ्यों के विपरीत हैं परंतु फिर भी समाज का एक बड़ा हिस्सा इन्हें सही मान बैठा है।
इन मिथकों का निर्माण शनैः.शनैः किया गया। गौमांस से जुड़े मुद्दों को लेकर गायों के व्यापारियों और दलितों के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा की खबरें आती रहती हैं। गाय का इस्तेमाल समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया जाता रहा है। गायों की खाल का व्यापार करने वाले दलितों की हरियाणा के गोहाना सहित कई स्थानों पर हत्या की घटनाएं हुई हैं और विहिप के नेताओं ने इन हत्याओं को औचित्यपूर्ण ठहराया है।
सच यह है कि गौमांस भक्षण और गायों की बलि देने की परंपरा भारत में वैदिक काल से थी। कई धर्मग्रंथों में यज्ञों के दौरान गाय की बलि देने का जिक्र है। अनेक पुस्तकों में गौमांस भक्षण का जिक्र भी है। तेत्रैय ब्राह्मण का एक श्लोक कहता है ';अथो अन्नम विया गऊ'; ;गाय सच्चा भोजन है  । अलग.अलग देवताओं को अलग.अलग किस्म का गौमांस पसंद था। प्रोफेसर डीएन झा ने अपनी उत्कृष्ट कृति में इस तरह के कई उदाहरणों को उद्वत किया है।
भारत में अहिंसा की अवधारणा कृषि आधारित समाज के विकास के साथ आई। जैन धर्म हर प्रकार की हिंसा के खिलाफ था। बौद्ध धर्म भी अहिंसा का पैरोकार व पशु बलि का विरोधी था। इन धर्मों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांत की प्रतिक्रिया स्वरूप व उसके प्रतिउत्तर में, काफी बाद में, ब्राह्मणवाद ने गाय को अपने प्रतीक के रूप में अंगीकार किया। चूंकि ब्राह्मणवाद स्वयं को हिन्दू धर्म के पर्याय के रूप में प्रचारित करना चाहता था इसलिए उसने यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि गाय सभी हिन्दुओं के लिए पवित्र और पूजनीय है। सच यह है कि समाज के कई वर्ग, विशेषकर दलित और आदिवासी, लंबे समय से गौमांस भक्षण करते आए हैं। यह अलग बात है कि हिन्दुत्व के बढ़ते प्रभाव के चलते कई समुदायों, जिनके लिए गौमांस प्रोटीन का समृद्ध व सस्ता स्त्रोत था, को इसे छोड़ने या छोड़ने पर विचार करने के लिए बाध्य किया जा रहा है।
भाजपा और उसके संगी.साथियों के दावों के विपरीतए स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक बड़ी सभा में भाषण देते हुए कहा थाए ';आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीनकाल में विशेष समारोहों में जो गौमांस नहीं खाता था उसे अच्छा हिंदू नहीं माना जाता था। कई मौकों पर उसके लिए यह आवश्यक था कि वह बैल की बलि चढ़ाए और उसे खाए'; ';शेक्सपियर क्लब, पेसेडीना, कैलीर्फोनिया में 2 फरवरी 1900 को';बौद्ध भारत'; विषय पर बोलते हुए ';द कम्पलीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद';, खण्ड 3, अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1997 पृष्ठ 536
                                         स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रायोजित कई अन्य अनुसंधान परियोजनाओं ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है। इनमें से एक में कहा गया है ';ब्राह्मणों सहित सभी वैदिक आर्य, मछली, मांस और यहां तक कि गौमांस भी खाते थे। विशिष्ट अतिथियों को सम्मान देने के लिए भोजन में गौमांस परोसा जाता था। यद्यपि वैदिक आर्य गौमांस खाते थे तथापि दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था। गाय को ';अघन्य'; ;जिसे मारा नहीं जाएगा  कहा जाता था परंतु अतिथि के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता था वह था ';गोघ्न'; ;जिसके लिए गाय को मारा जाता है  । केवल बैलों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों को मारा जाता था। ';सुनीति कुमार चटर्जी व अन्य द्वारा संपादित ';द कल्चरल हेरीटेज ऑफ इंडिया';खण्ड.1m प्रकाशक रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता में सी कुन्हन राजा का आलेख';वैदिक कल्चर';, पृष्ठ 217
महाराष्ट्र सरकार के विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के पश्चात्, मुंबई के देवनार बूचड़खाने के हजारों श्रमिकों, जो इसके कारण अपना रोजगार खो बैठेंगे, ने 11 मार्च को इसके खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। अलग.अलग धर्मों के कई व्यवसायी महाराष्ट्र सरकार के इस साम्प्रदायिक कदम का विरोध करने के लिए मुंबई के आजाद मैदान में एकत्रित हुए।  नए कानून के खिलाफ बंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें यह कहा गया है कि गौमांस पर प्रतिबंध, नागरिकों के अपना भोजन चुनने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
हमें आशा है कि समाज, राजनैतिक लक्ष्य पाने के लिए किए पहचान से जुड़े इस तरह के मुद्दों के दुरूपयोग को रोकने के लिए आगे आएगा। लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह उनपर छोड़ दिया जाना चाहिए और मांस के व्यवसाय से जुड़े श्रमिकों और व्यवसायियों से उनकी रोजी.रोटी नहीं छीनी जानी चाहिए।
-राम पुनियानी

सोमवार, 9 मार्च 2015

Banning beef goes beyond religious connotations

Banning beef goes beyond religious connotations #BeefBan

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When I mentioned it to him, a well-meaning political friend urged me not to touch the subject or write about it. “Beef is a sensitive issue,” he said, “it has religious connotations. And you are a Christian…”
I thought about it but decided to go ahead anyway. The manner in which the BJP-led government in Maharashtra has banned the cutting, eating and very possession of beef is disturbing. And to me, it is not a religious issue but a broader social and economic one – linked to the liberalism that is the bedrock of our Constitution.
Beef is a cheap meat. It is often called the “poor man’s protein”. In Maharashtra it is eaten by Muslims and Christians, and by some Dalit communities that do not belong to religious minorities. As a magnet for economic migrants from across India, the Mumbai-Pune region is also home to many from the Northeast who consume beef.
By banning beef in such a draconian and absolutist fashion, the state government will only drive up prices of other meats. This will have an inflationary impact and will raise household food bills. It will affect livelihoods of traders and butchers who deal with bovine meat.
The decision is impulsive and political and has not considered the impact on agriculture and on the Maharashtra farmer. There are long-standing agrarian problems in the state. One of these is a whopping 61 per cent shortage in fodder, if one compares fodder required for livestock, largely cows and buffaloes, against what is available. With the ban, this fodder shortage will worsen. It will push up input costs for farmers.
Lastly, there is my concern about perceptions and inclusiveness. India is a ‘live and let live’ society. Beef is forbidden among most Hindus and the cow is held sacred. I respect that and am certainly not asking for beef to be served at state banquets or in the Parliament canteen. But to ban its use and consumption even in the privacy of a citizen’s home and kitchen?
It strikes me as odd that I can walk into a supermarket in Dubai – which is not a democracy and not a model for Indian society – enter a sub-section of the meats area and buy pork, which is forbidden in Islam. I have seen simple signs outside such demarcated areas that say: “Pork and pork products: For non-Muslims only”.
Can we not imagine something similar for beef in India? Do bans like this serve any purpose other than simply putting off some people – and contravening the spirit of the Constitution, as the BJP-led government in Mumbai is doing, even without amending it? The pursuit of an agenda of religious divisiveness does not start with grand pronouncements. It starts with relatively small events like these.
That is why I decided to write this piece. I plan to iterate its contents this week in th Rajya Sabha. I hope the Chairman gives me permission.
Derek O’Brien
Member of Parliament
Leader in the Rajya Sabha and National Spokesperson, All India Trinamool Congress
http://quizderek.blogspot.in/2015/03/banning-beef-goes-beyond-religious.html

रविवार, 8 मार्च 2015

What About India’s Daughters In The Conflict Zones?

What About India’s Daughters In The Conflict Zones?
By Devika Mittal
08 March, 2015
Countercurrents.org

With the Government’s ban on “India’s documentary”, made around the 16 December gang rape case known as the Nirbhaya case, the case is once again in the public sphere. The BBC documentary was scheduled for release on the International Women’s day. The documentary led to a controversy pertaining to the statement of one of the rapists who still blamed the victim. Another controversy attached with it has been the permission issue, the Government denies having given the permission to interview the rapists. In the light of these controversies, the Government decided to ban it. However, the people have resisted the ban. Since its release online, the documentary claims a viewership of about a million.
The documentary has also been a point of talk because of the controversial statements. Since its release, people have shared their views, debated on the statement, on how the statement may not be an unusual mentality. The mentality is embedded in the patriarchal society. It is recognized that this mentality is also shared by people’s ‘representatives’, the politicians and those who are supposed to defend us or impart justice. People have also been suggesting that the system needs to be improved, needs to be empowered to curb these incidents. While this is true, what is still required to recognize and highlight is that not just the mentality to justify rape, the inefficiency of the system but how the very system has also used rape as a weapon to control dissent or voice against the oppression of the State.
This is to point at the cases of rape and sexual violence in the conflict zones of India – the North-East states (except Sikkim), Jammu & Kashmir and Naxalite zones. To tackle the challenges in the conflict zones, the Indian State has adopted draconian laws which in the garb of restoring law and order have led to gross violation of human rights’. One such law is the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA). Enforced in the North-East states (except Sikkim) and the state of Jammu & Kashmir, AFSPA gives the right to the armed forces to shoot at sight, torture, raid houses, arrest without warrant AFSPA also protects the army persons with legal impunity. These extra-ordinary and unrestrained powers to the armed forces have led to extra-judicial killings, fake encounters, extra-judicial disappearances, tortures and rapes.
This has been corroborated by the reports of the national and international human-rights’ commissions and organisations, Government’s own appointed committees and the Judiciary. The Justice J.S. Verma Committee that was set up to suggest amendments to laws relating to crimes against women, has recommended review of the continuance of the Armed Forces (Special Powers) Act (AFSPA) in the context of extending legal protection to women in conflict areas. It also recommended that the security forces should not be able to take cover under the AFSPA in cases of rape and sexual assault and that cases of sexual violence against women by members of the armed forces or uniformed personnel should be brought under the purview of ordinary criminal law.
Similarly, the laws used to control naxalism have also led to the violation of human rights. Innocent tribals are falsely implicated in cases, tortured, raped and killed. While there are thousands of cases of sexual violence, known and unknown, reported and unreported, here are some of the known cases that still await justice:
Thangjam Manorama from AFSPA-affected Manipur – On 10 July 2004, Thangjam Manorama, a Manipuri woman, was picked up from her home by the Indian paramilitary unit, 17th Assam Rifles on allegations of being associated with a militant group. The next morning, her bullet-ridden corpse was found in a field. There were bullet marks even in her private parts. An autopsy revealed semen marks on her skirt suggesting rape and murder. It has been 10 years now but justice is yet to be done.
Rape and Killing of Asiya and Nilofar Jan - On 29th May 2009, in Shopian (J&K), two women named Asiya (age 17) and Neelofar (age 22) went missing. Their dead bodies were found next morning. The people alleged it to be a case of rape and murder by security forces who were camped nearby.
Initially, no FIR was lodged and police told that postmortem report cleared injuries over private parts. However, the people believed that police report about postmortem is fake and so they continued protests and forced J&K Government to form a judicial panel. Under judicial inquiry, the Forensic lab report established that they had been gang-raped. Apart from few suspension and transfers from police department, nothing has happened in this case.
Victims of the mass-rape of Kunan Posphora Village - During the intervening night of February 23 and 24 in 1991, the twin villages of Kunan and Poshpora in north Kashmir’s Kupwara district witnessed mass rape of over 40 women by the soldiers of the Army’s 4 Rajputana Rifles of 68 Brigade. The victims included young female children, pregnant women and even aged women. This incident has been acknowledged even by the Former Union External Minister, Salman Khurshid’s who said, “I am ashamed that it happened in my country. I am apologetic and appalled that it has happened in my country.” However, justice continues to evade them.
Sexual Harrasment of Soni Sori, an Adivasi Civil Rights’ Activist - Soni Sori, a 35-year-old Adivasi school teacher in Chhattisgarh, was alleged to be a Naxalite. While evidence shows that she was against them, she was framed by the Chhattisgarh police. She was sexually harassed by the police and was also given electric shocks. In the medical examination, small stones were found in her vagina and rectum. The main person who had supervised the torture was Ankit Garg, the Superintendent of Police. What did the state do? He was honored with the President's Award on Republic Day.
As stated previously, sexual violence in the conflict zones are not an aberration. They are widespread. Yet, they do not evoke the same outrage that this particular incident in a non-conflict zone has received. The Government, the judiciary and even those people who are aware of this reality remain silent. Aren’t these the daughters of India too? Aren’t they women as well? This hypocrisy needs to be addressed. Respect and rights cannot be exclusive or the entitlement of only a particular section of women.
Devika Mittal, M.Phil student of Sociology at Delhi School of Economics; Core member of Mission Bhartiyam; Convenor(India) of Aaghaz-e-Dosti
Blog: www.devikamittal.wordpress.com | Twitter: @devikasmittal

Analysing The Dimapur Lynching



Analysing The Dimapur Lynching
By Sazzad Hussain
08 March, 2015
Countercurrents.org
Whatever the primordial wild instinct, explained in novels of Conrad and Golding, that the hysteric mob of Dimapur in Nagaland, a northeastern state in India, manifested while dragging out an under trial rape accused from the Central Jail and his lynching on 5th March, our eyes have been wide opened trying to absorb the shock and getting some answers to that horrific act. As the blood and dust settles on the streets of this commercial hub of Nagalad, different twists and turns are now emerging from the incident which was initially considered to be a rape case.
So far the narrative is that the victim, Sayed Sharifuddin Khan, a thirty-five years old trader in Dimapur was accused of rape by a Naga girl. Accordingly Khan was arrested by the police and lodged inside the Central Jail in Dimapur for judicial proceedings. After that the local public and women bodies took out protest marches demanding the authorities to hand over the accused to them. The crowd was led by Naga Students Federation. As the authorities refused to oblige, the swelling crowd moved towards the jail, broke its gate and dragged out the accused, stripped naked and paraded a long stretch of seven kilometres to the city’s centre point while hitting and hacking with sharp weapons. As the victim fell down, he was tied behind a motor cycle and dragged several kilometres in which he succumbed to his injuries. Thereafter, as the Taliban did to President Dr. Nazibullah in Kabul in 1996, the corpse of the accused was hanged on a tower. This modern day lynching was photographed by mobile wielding youth as souvenirs. The entire act was committed in broad day light where the police and the civil administration choose to remain nonchalant. The punch line of the narrative was that the “rapist”, who was also an “illegal Bangladeshi immigrant”, got his punishment in a country where the justice delivery system is very slow.
When the medical examination report of the rape victim came out, it gave a negative answer. There was no trace of rape on her body. Further, the CCTV footage of the hotel where the incident had allegedly happened also send a clear picture—both the girl and the accused were seen in normal stature. Nor Sayed Sharifuddin Khan was an illegal Bangladeshi immigrant, his father was a retired IAF personnel from Karimganj, Assam while two of his brothers are still serving in the Indian Army and he was married to a local Naga woman. Then what made the people of Dimapur so impatient to create a kangaroo court and do the lynching ?
The answer is politics—dirty, heinous politics and the long process of collaboration of militants, criminals and anti-social elements with an ethnic tinge that culminated in together to create this savagery. Ever since the all-powerful Chief Minister Neiphu Rio was elected to the Lok Sabha in 2014, there has been a power struggle in Kohima. Rio’s successor, T.R. Zelliang has been facing pressure from his fellow NPF party members and had a no-confidence motion in January this year. The politics of clan and ethnicity for dominance is a key element for this dissidence. The dissident group is headed by a leader who is an ethnic Sema. In Dimapur, the only commercial town of Nagaland, the Semas are in the majority. It is learnt that this Sema leader, along with militants, anti-socials and criminals incited the crowd to go wild in order to create a law and order breakdown in the state to bring down Zelliang’s government.
In the ethnically defined Nagaland society, the Semas (now called Sumi) upward social mobility is very poor , though once it had a very good leader Hokishe Sema, four times Chief Minister and Governor of Himachal Pradesh. The Semas were responsible for grabbing thousands of acres of reserved forest land on the non-demarcated Assam-Nagaland border from the 1980s. As they were hill dwellers with no tradition of doing agriculture of the plains, the Semas brought and settled thousands of flood and erosion affected peasants from Morigaon district of Assam, who were Muslims of east-Bengali descent. These hardworking peasants cleared the forests and transformed Nagaland’s agriculture landscape with all types of seasonal products along with animal husbandry. In the course of time there were many matrimonial relationships between these Muslims and Semas and their new generation came to be known as Sumiyan (Sumi+Miyan).
Secondly the big business of Dimapur has been operated by Hindi speaking north Indians and there was no retailers and small vendors from the local tribes. To fill the void, these Muslims and people from Barak Valley of Assam came in large numbers as small traders. From the 1990s the state government erected many commercial complexes and sheds in Dimapur and most of them were leased by the local beneficiaries to these traders from Assam. As Dimapur is the only business centre of Nagalad, there always has been tussle among various militant groups over its control. Many splinter groups and renegade leaders of militant outfits have made things worse for outside traders in the town for quite a long time. The ‘illegal Bnagladeshi immigrant’ tag is one such outlet to maintain that bullying and threatening order in favour of the Sema interests. The bid for supremacy by Semas, in form of militancy, criminal and anti-social thugs and their bonhomie with politicians have led to a situation which has been waiting for a chance and since the ‘rape victim’ was a Sema it got a perfect launch pad. Ironically, the wife of Sayed Sharifuddin Ahmed was a Sema and the ‘rape victim’ was from her same village and lived next door to their rented house in Dimapur in a close family like relation. It was learnt that the Sema girl had a business partnership with Khan and a dispute over some monetary matters led to the framing of the latter as a rapist.
Now Delhi is watching. In the national capital, North Eastern people, including Nagas face a lot of trouble attributed to racism. But what sort of a society does the Dimapur lynching reflect. I think the Naga civil society will give an answer. The insurgency-hit state, which has not witnessed a single exchange of bullets between the NSCN (IM) and the security forces since the 1997 ceasefire, should retrospect and come to terms with the reality. The Church in Nagaland is the unifying factor for all the conflicts. It has been largely responsible for the reduced number of violence among the people in that state. Now the Church can play an important role to reign in the frenzied masses so that lynchings like Dimapur do not get repeated.
(The writer is a freelance writer based in Assam, India. E-mail:sazzad.hussain2@gmail.com)