मंगलवार, 16 जून 2015

बिल्ली

बिल्ली

शाम का समय था। रामदीन खेत से घर वापस आ रहा था। राह में उसके आगे से एक बिल्ली गुजरी। वह एकदम ठहर गया। वह राह में किसी एक खेत के किनारे बैठ गया। वह सोच में पड़ गया। उसने सुना हुआ था-बिल्ली का रास्ता काटना शुभ नहीं होता। वह मन-ही-मन चाह रहा था कि कोई रास्ता पहले पार करे। यह आम रास्ता था। लेकिन आना-जाना इस समय अधिक नहीं था। उसे बैठे हुए पन्द्रह मिनट हो गए। उसे पीछे एक साइकल सवार आता दिखाई दिया। उसे राहत मिली। वह सोचने लगा, इसके गुजर जाने के बाद वह चल पड़ेगा।
साइकल सवार रामदीन के पास आकर रुक गया। वह रामदीन से परिचित नहीं था। साइकल सवार ने समझा कि रामदीन कोई राहगीर है। यह थककर बैठ गया होगा।
उसने रामदीन से पूछाः आप किस की बाट देख रहे हैं? रामदीन ने वैसे ही उत्तर दियाः मैं थक गया था। थोड़ा सुस्ताने के लिए बैठ गया था।
रामदीन साफ-साफ नहीं बताना चाहता था।
साइकल सवार ने कहा-मेरी साइकल पर पीछे बैठ जाओ। बड़ी सड़क तक मैं ले चलूंगा। रामदीन लेट हो रहा था। वह जाना भी चाहता था। उसे फिर बिल्ली याद आ गई। उसने मन में सोचा, साइकल सवार भी जा रहा है। वह तो पीछे बैठेगा। मुझ से आगे वो साइकल सवार है। यह सोचकर वह साइकल पर बैठ गया।
रामदीन उलझन में था। उसने साइकल सवार से बात छिपाई थी। उसने साइकल सवार से साफ-साफ बताने का फैसला कर लिया। रास्ता ज्यादा साफ-सुथरा नहीं था। बड़ी सड़क एक कोस दूर थी। सड़क आने मंे लगभग बीस मिनट लगना था।
रामदीन ने साइकल सवार से कहा-भाई, मैंने आप से छिपाया था। असल में बात ये है कि बिल्ली रास्ता काट गई थी। मैं इसलिए बैठ गया था। मैंने सुना है, बिल्ली का रास्ता काटना शुभ नहीं होता। इतना कह कर रामदीन का मन हलका हो गया। रामदीन यह भी सोचने लगा कि कहीं साइकल सवार बुरा न मान जाए।
साइकल सवार ने सुन लिया, परंतु कहा कुछ नहीं। रामदीन ने फिर पूछा-क्या बिल्ली के रास्ता काटने को आप अशुभ नहीं मानते? साइकल सवार ने उत्तर दिया-भाई, मैंने तो बिल्ली देखी नहीं। मुझ पर क्या फरक पड़ेगा।
रामदीन ने सोचा कि साइकल सवार ठीक कह रहा है। उसके कुछ बोलने से पहले ही साइकल सवार ने रामदीन से एक सवाल कर दिया।
बिल्ली बाएं से दाएं गुजरी थी या दाएं से बाएं? सवाल सुनकर रामदीन कुछ असहज हो गया। वह संभल कर बैठा। उसे ऐसे सवाल की आशा नहीं थी। उसे पता था कि बिल्ली किधर से गुजरी थी। वह यही समझा कि हो सकता है इसका भी कोई फरक पड़ता हो। उसके जवाब देने से पहले ही, साइकल सवार ने दो सवाल और कर दिए।
बिल्ली कैसे रंग की थी?
बिल्ली थी या बिल्ली का बच्चा?
रामदीन का सिर चकराने लगा। उसे क्या पता था कि बात यहां तक आ जाएगी। उसके मन में आया-हो सकता है साइकल सवार ये सारी बातें जानता हो। उसने ये भी सोचा-हो सकता है साइकल सवार इन बातों को मानता ही न हो। उसने ये भी सोचा-जिकर नहीं करता तो ही अच्छा था। लेकिन अब तो बात चल पड़ी थी। बात भी उसी ने चलाई थी।
रामदीन को कुछ नहीं सूझ रहा था। वह जवाब दे तो क्या। उसने हिम्मत करके साइकल सवार से पूछ ही लिया-क्या आप इन बातों को नहीं मानते?
साइकल सवार कुछ समझदार था। वह जानता था कि रामदीन भोला है। वह सीधे-सीधे कोई उत्तर नहीं देना चाहता था। उसने रामदीन से एक और सवाल कर दिया-भाई, एक बात बता। आप घर के सामने पहुंच जाते हो और आपके आगे बिल्ली आ जाए। आप घर के भीतर जाओगे या नहीं?
रामदीन ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था। उसे लगा-ये साइकल सवार बड़ा अजीब आदमी है।
बातों-ही-बातों में रास्ता कट गया था। बड़ी सड़क के किनारे दोनों उतर गए। बड़ी सड़क पर एक प्याऊ से दोनों ने पानी पीया। रामदीन को सीधे जाना था। साइकल सवार को बाएं सड़क पर जाना था। रामदीन ने साइकल सवार का धन्यवाद किया। सड़क पर चारों ओर की आवा-जाही थी। जैसे ही रामदीन सड़क पर चढ़ने लगा, गजब हो गया। एक बिल्ली चोराहे पर से गुजर गई। रामदीन का चेहरा देखने लायक था। उसने माथे पर हाथ लगाया। वह मन-ही-मन बुदबुदाया-आज यह बिल्ली मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी।
उसने देखा, यातायात उसी तरह चल रहा था। किसे फुरसत थी बिल्ली की सोचने की। रामदीन ने सड़क पार की। वह धीरे-धीरे चल रहा था। वह घर के पास आ गया था। उसे फिर बिल्ली की याद आई। मन-ही-मन कहने लगा-हे भगवान, अब बिल्ली को मत भेजना। भगवान ने रामदीन की मानो सुन ली। कोई बिल्ली नहीं आई। वह घर के भीतर आ गया था।
उसने हाथ-मुंह धोया और खाट पर लेट गया। उसकी पत्नी उसके लिए पानी लेकर आई। रामदीन कुछ मुस्कराया।
उसकी पत्नी बोली-आज क्या खास बात है?
रामदीन बोला-भागवान, आज तो कमाल ही हो गया।
ऐसी क्या बात है, वह बोली।
रामदीन ने कहा-आराम से बैठ और सुन।
वह पास में पीढ़ा लेकर बैठ गई।
रामदीन ने सारी गाथा गा दी।
उसकी पत्नी बोली, पहले आप खाना खा लें।
उसने खाना परोसा। रामदीन खाना खाने लगा।
वह कहने लगी-अब आप थोड़ी ही देर में साक्षरता की क्लास में जाओगे। वहां इस बात की चर्चा करना। फिर सुनना वे क्या कहते है?
रामदीन खाना खा कर पड़ोस में लगने वाली क्लास में आ गया। वह आज कुछ लेट था। उसने सभी से राम-राम की और बैठ गया। आज रामदीन के चेहरे पर कुछ अलग ही बात थी। औरों को भी पहचानने में देर नहीं लगी। इससे पहले कि वे कुछ पूछते, रामदीन ने ही बताना शुरू कर दिया।
वह बोला-मास्टर जी, आज तो आप मेरी उलझन सुलझाओ। आज की पढ़ाई कल कर लेंगे।
सभी उत्सुक थे कि रामदीन क्या बोलता है।
रामदीन ने अपनी सारी रामकहानी कह दी।
सभी मास्टर जी के मुंह की ओर देख रहे थे। वे भी ऐसे सवालों में रुचि रखते थे। मास्टर जी ने ऐसी बातें सुनी हुई थी। वह सब समझता था। वह सोच रहा था कि कैसे जबाब दूं। मास्टर जी ने बारी-बारी सभी से पूछा कि वे क्या कहना चाहते हैं। सभी ने तो अपनी-अपनी राय दी। कइयों ने इसे अशुभ बताया। कइयों ने इसे मन का वहम बताया। कइयों ने बताया कि बात तो चलती ही जा रही है। रामदीन सुन कर सोचने लगा कि बात तो बीच में अटक गई। कोई एक राय तो है नहीं। वह दुविधा में था, कौन सही है कौन नहीं।
अब मास्टर जी की बारी थी। सब ध्यान से सुनने लगे। उन्होंने कहा-भाइयों, बात तो मैंने भी सुनी है। पर एक बात सुनो-आपने एक बात और भी तो सुनी है।
एक ने पूछा-मास्टर जी, कौन सी बात?
मास्टर जी-अपने दीवाली के दिन सब इंतजार करते हैं कि बिल्ली उनके घर आए। उस दिन बिल्ली लक्ष्मी हो जाती है।
कुछ बोले-हां, सुना तो ऐसा भी है।
मास्टर जी-तो भाइयो, क्या दीवाली वाले दिन बिल्ली की तासीर बदल जाती है।
किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या जबाब दें।
मास्टर जी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा-चलो, हम सभी एक महीने तक एक तजुरबा करते हैं। जितनी बार भी हमारे सामने बिल्ली आएगी, हम रुकेंगे नहीं देखेंगे कितनी बार बिल्ली आती है और कितनी बार हमारा काम बनता-बिगड़ता है। एक महीने के बाद हम सब कुल मिलाकर हिसाब लगा लेंगे।
सब को यह बात पसंद आई। सब अपने-अपने घर आ गए। घर आते ही रामदीन की पत्नी बोली-स्याणे, बिल्ली दिमाग से उतरी कि नहीं?
रामदीनः उतरनी क्या थी और चढ़ गई। एक महीने का कोर्स और मिल गया। और सुन-एक महीने तक तूं भी देखिए। उसकी पत्नी बोली-ये तो अच्छी बात है, पहले तजुरबा तो कर के देख लें, फिर देखेंगे। सुनने में तो हजार बातें आती हैं। क्या सारी ही ठीक होती हैं।

- वेदप्रिय, भिवानी

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