मंगलवार, 16 जून 2015

मार्क्सवाद और विज्ञान

मार्क्सवाद और विज्ञान

विज्ञान आधुनिक  समाज को बहुत गहरे तक प्रभावित कर रहा है। कम्प्यूटर से लेकर वैश्विक उष्णता तक, अंग-प्रत्यारोपण से लेकर कलोन तक, रोबोट से लेकर अन्तरिक्ष अभियानों तक तथा शिक्षा स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, उर्जा या खेल आदि का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहां समाज विज्ञान की ओर न ताकता हो। इसलिए जरूरी हो जाता है कि विज्ञान को समझा जाए। मार्क्सवादियों के लिए विज्ञान किस तरह महत्वपूर्ण है ये और बात है, लेकिन विज्ञान के लिए मार्क्सवाद को समझना ज्यादा जरूरी है। मार्क्सवाद कहता है कि विज्ञान को सामाजिक व ऐतिहासिक परिस्थितियों से अलग करके अमूर्त बना कर नहीं समझा जा सकता। इसके साथ मार्क्सवाद यह भी स्वीकार करता है कि सामाजिक बुनावट के साथ चलते विज्ञान की अपनी भी वस्तुनिष्ठ वैधता   है। मार्क्सवाद विज्ञान का अच्छा आलोचक होने के साथ-साथ इसका रक्षक भी है। इस बात की आलोचना क्यों नहीं होनी चाहिए कि पूंजीवादी व्यवस्था में न जाने कितनी वैज्ञानिक खोजों का दुष्प्रयोग होता है। यह क्या बात हुई कि काम को आसान बनाने व काम की गति तेज करने के नाम पर तकनीक न जाने कितने ही लोगों को बेरोजगार बना दे।
मार्क्सवाद की एक मौलिक मान्यता यह है कि इस विश्व को समझने व इस पर नियंत्राण करने की क्षमता मनुष्य में है। प्रकृति विज्ञान के विकास ने भी मनुष्य के इस विजय गान की घोषणा की है। मार्क्स और एंगेल्स का विज्ञान प्रेम इसी बात से जाहिर है कि उन्होंने अपने कार्य ‘सामाजिक विकास के इतिहास’ को वैज्ञानिक व भौतिक आधर पर प्रस्तुत किया है। वैज्ञानिक दार्शनिकों का एक बड़ा खेमा यह मानता है कि स्वयं विज्ञान के अन्दर अपना एक विचार समूह का ढांचा है, अपनी निश्चित विध् िहै जो इसके रेशनल और वस्तुनिष्ठ होने की गारंटी करती है। जबकि मार्क्सवाद यह कहता है कि विज्ञान भी एक सामाजिक ताने-बाने से बुने हुए व्यवहार में पैदा होता है। जिस प्रकार समाज स्थिर नहीं है, उसी प्रकार विज्ञान की संकल्पनाएं  और विध् िभी समय आने पर बदलती है। विज्ञान के अन्य दार्शनिक जो ये कहते हैं कि विज्ञान की अपनी कोई विध् िया सि(ांत नहीं है, इसकी प्राप्तियों की कोई वस्तुनिष्ठ वैध्ता नहीं है, उनके लिए मार्क्सवाद का कहना है कि विज्ञान प्रकृति के रहस्यों पर से परदा हटाने का एक विशिष्ट तरीका है। विज्ञान का विकास बनी-बनाई और वर्चस्वकारी विचारधराओं की मान्यताओं को जांचने-परखने का एक जरिया है।
स्वयं मार्क्स ने विज्ञान पर कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। लेकिन अपने पूरे साहित्य में वे विज्ञान की प्रकृति और इसकी कार्यविध् िपर लगातार टिप्पणियां करते हैं। ऐसा लगता है मानो वे अपने पूरे साहित्य ‘‘समाज का ऐतिहासिक, आर्थिक एवं राजनैतिक विश्लेषण’’ को किसी प्रकृति विज्ञानी की खोज के सामने रख कर देख रहे हों। विज्ञान के बारे में मार्क्स के विचार उनकी लिखी पुस्तकों में नजर आते हैं। मार्क्स के समकालीन अध्किांश विचारक ये मानते थे कि ‘ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभव ज्ञान’ ही विज्ञान का आधर है। मार्क्स व्यवहारवादियों ;म्उचमतपबपेजेद्ध के इस विचार को नकारते हैं। मार्क्स एक यथार्थवादी विचारक थे, उनके अनुसार पदार्थीय विश्व का स्वतंत्रा अस्तित्व है। यहां एक सवाल उठता है कि क्या वस्तुनिष्ठ सच्चाई मानव सोच का एक सै(ांतिक प्रश्न है या व्यवहारिक प्रश्न। अर्थात विचार वास्तविक है या अवास्तविक? इस सवाल पर मार्क्स के विचारों को लेकर बहुत भ्रम रहे। मार्क्स ने इसे बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा है-जिस प्रकार दर्पण किसी वस्तु ;पदार्थद्ध को प्रतिबिम्बित करता है, उसी प्रकार विचार मानव मस्तिष्क रूपी दर्पण में वस्तुओं का बना प्रतिबिम्ब है जो अनेक रूपों में दिखाई देता है।
मार्क्स इसे आगे स्पष्ट करते हैं कि यह इतना आसान भी नहीं है कि प्रकृति के सामने एक दर्पण रख देंगे और सच ;ज्ञानद्ध सामने दिखाई दे जाएगा। ज्ञान केवल तभी प्राप्त होगा जब हम सतह के नीचे होने वाली सभी हलचलों को समझ कर कोई रचनात्मक सि(ांत बनाएंगे, एक ऐसा सि(ांत जो प्रेक्टिस में खरा उतर जाए। सच का दावा करने वाली चीज के बारे में सि(ांत देना एक बात है परन्तु ज्ञान के बारे में सि(ांत ;जो बताए कि सच कैसे खोजा जाता हैद्ध देना बिल्कुल अलग बात है। वे ही विचार ठीक माने जाते हैं जो स्वतंत्रा यथार्थ के साथ संगति करते हैं। सबसे मुख्य बात जो मार्क्स कहते हैं, वह यह है कि समय और इतिहास से स्वतंत्रा ऐसी कोई संकल्पनाएं नहीं जिनसे विज्ञान के सि(ांत गढ़े जा सकें तथा समय और इतिहास से स्वतंत्रा ऐसी कोई विज्ञान विध् िनहीं जिस पर इन सि(ांतों को परखा जा सके।
मार्क्स विज्ञान में एक द्वन्द्वात्मक प्रव्रिफया देखते हैं कि इस भौतिक विश्व में विज्ञान की विध् िव संकल्पनाएं और इसके सि(ांत काल खण्डों में आपस में गतिशील अन्तःव्रिफयाएं करते रहते हैं। यह प्रव्रिफया सच के और निकट ले जाती है। इसके इलावा वे विज्ञान में एक और द्वन्द्वात्मकता देखते हैं कि इन अन्तःव्रिफयाओं के चलते एक समय विशेष पर कुछ मूलभूत परिवर्तन होते हैं और एक नई चीज सामने आती है। इस प्रकार वे पूरी प्रव्रिफया को एक चलायमान परिस्थिति में देखते हैं। वे ये भी मानते हैं कि यह प्राकृतिक विश्व बहुत ही जटिल और विविध् है और इसकी द्वन्द्वात्मकता इसी में है कि एक विशेष मोड़ तक प्रकृति के पहलुओं को इसके सापेक्ष एक अमूर्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाए और ये अमूर्त मॉडल और अध्कि ठोस परिस्थितियों को शामिल करते हुए एक ज्यादा विकसित मॉडल के रूप में सामने आए। मार्क्स अपने आर्थिक विश्लेषण को भी इसी रूप में देखते हैं।
विज्ञान के बारे में मार्क्स के विचारों पर सबसे ज्यादा ठोस लेखन एंगेल्स की पुस्तकों में है। एंगेल्स की श्क्पंसमबजपबे व िछंजनतमश् एक ऐसी पुस्तक है जिसमें एक पूर्ण वैज्ञानिक विश्वदृष्टिकोण की झलक मिलती है। उन्नीसवीं सदी का मध्य ऐसी वैज्ञानिक खोजों का समय था जब विज्ञान संव्रफमण काल में था, और इसके साथ ही नए समाज की पृष्ठभूमि भी तैयार हो रही थी। यह पुस्तक प्रकृति और समाज के बीच मौलिक एकता का सबसे अच्छा उदाहरण है। इस पुस्तक में एंगेल्स तीन महान वैज्ञानिक खोजों के हवाले से प्रकृति की द्वन्द्वात्मकता दर्शाते हैं। पहली थी 1838-39 ;डश्र ैबीसमपकमद ंदक ज्ण् ैबीूंददद्ध में हुई पादप व जन्तु कोशिका के बीच एकता के सूत्रा तथा कोशिका सि(ांत ;कोशिका जीवन का आधरद्ध। इसमें सजीवों की एकता के सूत्रा छिपे थे। दूसरी थी 1842-47 के बीच ;श्र त् डंलवतए श्र च् श्रवनसमए ॅ त् ळतवअमए स् । ब्वसकपदह ंदक भ्ण् भ्मसउवज्रद्ध हुई उफर्जा की संरक्षता का नियम। इसके अन्तर्गत इस प्रकृति में पदार्थ की अनवरत गति ;संव्रफमणशीलताद्ध यात्रा उफर्जाओं के रूपान्तरण के माध्यम से सि( हो गई थी। तीसरी महत्वपूर्ण खोज थी 1859 में डार्विन के द्वारा प्रस्तुत पुस्तक श्व्द जीम व्तपहपद व िैचमबपमे इल उमंदे व िछंजनतंस ैबसमबजपवदश्ण् इन पुस्तकों ;खोजोंद्ध के माध्यम से दर्शन के नजरिए से प्रकृति की भौतिक संकल्पना में द्वन्द्वात्मकता स्पष्ट हो चुकी थी।
मार्क्स व एंगेल्स के बीच अच्छा तालमेल था। उन्होंने अपने काम का बंटवारा किया हुआ था। मार्क्स गणित, तकनीक के इतिहास व रसायन शास्त्रा में निपुण थे, जबकि एंगेल्स गणित, भौतिकी, जीव-विज्ञान, प्राणीशास्त्रा व खगोलविज्ञान में निपुण थे। यदि हम विज्ञान के इतिहास का अध्ययन करें तो

बिल्ली

बिल्ली

शाम का समय था। रामदीन खेत से घर वापस आ रहा था। राह में उसके आगे से एक बिल्ली गुजरी। वह एकदम ठहर गया। वह राह में किसी एक खेत के किनारे बैठ गया। वह सोच में पड़ गया। उसने सुना हुआ था-बिल्ली का रास्ता काटना शुभ नहीं होता। वह मन-ही-मन चाह रहा था कि कोई रास्ता पहले पार करे। यह आम रास्ता था। लेकिन आना-जाना इस समय अधिक नहीं था। उसे बैठे हुए पन्द्रह मिनट हो गए। उसे पीछे एक साइकल सवार आता दिखाई दिया। उसे राहत मिली। वह सोचने लगा, इसके गुजर जाने के बाद वह चल पड़ेगा।
साइकल सवार रामदीन के पास आकर रुक गया। वह रामदीन से परिचित नहीं था। साइकल सवार ने समझा कि रामदीन कोई राहगीर है। यह थककर बैठ गया होगा।
उसने रामदीन से पूछाः आप किस की बाट देख रहे हैं? रामदीन ने वैसे ही उत्तर दियाः मैं थक गया था। थोड़ा सुस्ताने के लिए बैठ गया था।
रामदीन साफ-साफ नहीं बताना चाहता था।
साइकल सवार ने कहा-मेरी साइकल पर पीछे बैठ जाओ। बड़ी सड़क तक मैं ले चलूंगा। रामदीन लेट हो रहा था। वह जाना भी चाहता था। उसे फिर बिल्ली याद आ गई। उसने मन में सोचा, साइकल सवार भी जा रहा है। वह तो पीछे बैठेगा। मुझ से आगे वो साइकल सवार है। यह सोचकर वह साइकल पर बैठ गया।
रामदीन उलझन में था। उसने साइकल सवार से बात छिपाई थी। उसने साइकल सवार से साफ-साफ बताने का फैसला कर लिया। रास्ता ज्यादा साफ-सुथरा नहीं था। बड़ी सड़क एक कोस दूर थी। सड़क आने मंे लगभग बीस मिनट लगना था।
रामदीन ने साइकल सवार से कहा-भाई, मैंने आप से छिपाया था। असल में बात ये है कि बिल्ली रास्ता काट गई थी। मैं इसलिए बैठ गया था। मैंने सुना है, बिल्ली का रास्ता काटना शुभ नहीं होता। इतना कह कर रामदीन का मन हलका हो गया। रामदीन यह भी सोचने लगा कि कहीं साइकल सवार बुरा न मान जाए।
साइकल सवार ने सुन लिया, परंतु कहा कुछ नहीं। रामदीन ने फिर पूछा-क्या बिल्ली के रास्ता काटने को आप अशुभ नहीं मानते? साइकल सवार ने उत्तर दिया-भाई, मैंने तो बिल्ली देखी नहीं। मुझ पर क्या फरक पड़ेगा।
रामदीन ने सोचा कि साइकल सवार ठीक कह रहा है। उसके कुछ बोलने से पहले ही साइकल सवार ने रामदीन से एक सवाल कर दिया।
बिल्ली बाएं से दाएं गुजरी थी या दाएं से बाएं? सवाल सुनकर रामदीन कुछ असहज हो गया। वह संभल कर बैठा। उसे ऐसे सवाल की आशा नहीं थी। उसे पता था कि बिल्ली किधर से गुजरी थी। वह यही समझा कि हो सकता है इसका भी कोई फरक पड़ता हो। उसके जवाब देने से पहले ही, साइकल सवार ने दो सवाल और कर दिए।
बिल्ली कैसे रंग की थी?
बिल्ली थी या बिल्ली का बच्चा?
रामदीन का सिर चकराने लगा। उसे क्या पता था कि बात यहां तक आ जाएगी। उसके मन में आया-हो सकता है साइकल सवार ये सारी बातें जानता हो। उसने ये भी सोचा-हो सकता है साइकल सवार इन बातों को मानता ही न हो। उसने ये भी सोचा-जिकर नहीं करता तो ही अच्छा था। लेकिन अब तो बात चल पड़ी थी। बात भी उसी ने चलाई थी।
रामदीन को कुछ नहीं सूझ रहा था। वह जवाब दे तो क्या। उसने हिम्मत करके साइकल सवार से पूछ ही लिया-क्या आप इन बातों को नहीं मानते?
साइकल सवार कुछ समझदार था। वह जानता था कि रामदीन भोला है। वह सीधे-सीधे कोई उत्तर नहीं देना चाहता था। उसने रामदीन से एक और सवाल कर दिया-भाई, एक बात बता। आप घर के सामने पहुंच जाते हो और आपके आगे बिल्ली आ जाए। आप घर के भीतर जाओगे या नहीं?
रामदीन ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था। उसे लगा-ये साइकल सवार बड़ा अजीब आदमी है।
बातों-ही-बातों में रास्ता कट गया था। बड़ी सड़क के किनारे दोनों उतर गए। बड़ी सड़क पर एक प्याऊ से दोनों ने पानी पीया। रामदीन को सीधे जाना था। साइकल सवार को बाएं सड़क पर जाना था। रामदीन ने साइकल सवार का धन्यवाद किया। सड़क पर चारों ओर की आवा-जाही थी। जैसे ही रामदीन सड़क पर चढ़ने लगा, गजब हो गया। एक बिल्ली चोराहे पर से गुजर गई। रामदीन का चेहरा देखने लायक था। उसने माथे पर हाथ लगाया। वह मन-ही-मन बुदबुदाया-आज यह बिल्ली मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी।
उसने देखा, यातायात उसी तरह चल रहा था। किसे फुरसत थी बिल्ली की सोचने की। रामदीन ने सड़क पार की। वह धीरे-धीरे चल रहा था। वह घर के पास आ गया था। उसे फिर बिल्ली की याद आई। मन-ही-मन कहने लगा-हे भगवान, अब बिल्ली को मत भेजना। भगवान ने रामदीन की मानो सुन ली। कोई बिल्ली नहीं आई। वह घर के भीतर आ गया था।
उसने हाथ-मुंह धोया और खाट पर लेट गया। उसकी पत्नी उसके लिए पानी लेकर आई। रामदीन कुछ मुस्कराया।
उसकी पत्नी बोली-आज क्या खास बात है?
रामदीन बोला-भागवान, आज तो कमाल ही हो गया।
ऐसी क्या बात है, वह बोली।
रामदीन ने कहा-आराम से बैठ और सुन।
वह पास में पीढ़ा लेकर बैठ गई।
रामदीन ने सारी गाथा गा दी।
उसकी पत्नी बोली, पहले आप खाना खा लें।
उसने खाना परोसा। रामदीन खाना खाने लगा।
वह कहने लगी-अब आप थोड़ी ही देर में साक्षरता की क्लास में जाओगे। वहां इस बात की चर्चा करना। फिर सुनना वे क्या कहते है?
रामदीन खाना खा कर पड़ोस में लगने वाली क्लास में आ गया। वह आज कुछ लेट था। उसने सभी से राम-राम की और बैठ गया। आज रामदीन के चेहरे पर कुछ अलग ही बात थी। औरों को भी पहचानने में देर नहीं लगी। इससे पहले कि वे कुछ पूछते, रामदीन ने ही बताना शुरू कर दिया।
वह बोला-मास्टर जी, आज तो आप मेरी उलझन सुलझाओ। आज की पढ़ाई कल कर लेंगे।
सभी उत्सुक थे कि रामदीन क्या बोलता है।
रामदीन ने अपनी सारी रामकहानी कह दी।
सभी मास्टर जी के मुंह की ओर देख रहे थे। वे भी ऐसे सवालों में रुचि रखते थे। मास्टर जी ने ऐसी बातें सुनी हुई थी। वह सब समझता था। वह सोच रहा था कि कैसे जबाब दूं। मास्टर जी ने बारी-बारी सभी से पूछा कि वे क्या कहना चाहते हैं। सभी ने तो अपनी-अपनी राय दी। कइयों ने इसे अशुभ बताया। कइयों ने इसे मन का वहम बताया। कइयों ने बताया कि बात तो चलती ही जा रही है। रामदीन सुन कर सोचने लगा कि बात तो बीच में अटक गई। कोई एक राय तो है नहीं। वह दुविधा में था, कौन सही है कौन नहीं।
अब मास्टर जी की बारी थी। सब ध्यान से सुनने लगे। उन्होंने कहा-भाइयों, बात तो मैंने भी सुनी है। पर एक बात सुनो-आपने एक बात और भी तो सुनी है।
एक ने पूछा-मास्टर जी, कौन सी बात?
मास्टर जी-अपने दीवाली के दिन सब इंतजार करते हैं कि बिल्ली उनके घर आए। उस दिन बिल्ली लक्ष्मी हो जाती है।
कुछ बोले-हां, सुना तो ऐसा भी है।
मास्टर जी-तो भाइयो, क्या दीवाली वाले दिन बिल्ली की तासीर बदल जाती है।
किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या जबाब दें।
मास्टर जी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा-चलो, हम सभी एक महीने तक एक तजुरबा करते हैं। जितनी बार भी हमारे सामने बिल्ली आएगी, हम रुकेंगे नहीं देखेंगे कितनी बार बिल्ली आती है और कितनी बार हमारा काम बनता-बिगड़ता है। एक महीने के बाद हम सब कुल मिलाकर हिसाब लगा लेंगे।
सब को यह बात पसंद आई। सब अपने-अपने घर आ गए। घर आते ही रामदीन की पत्नी बोली-स्याणे, बिल्ली दिमाग से उतरी कि नहीं?
रामदीनः उतरनी क्या थी और चढ़ गई। एक महीने का कोर्स और मिल गया। और सुन-एक महीने तक तूं भी देखिए। उसकी पत्नी बोली-ये तो अच्छी बात है, पहले तजुरबा तो कर के देख लें, फिर देखेंगे। सुनने में तो हजार बातें आती हैं। क्या सारी ही ठीक होती हैं।

- वेदप्रिय, भिवानी