मंगलवार, 6 सितंबर 2016

CASTE-RAM PUNYANI

उना, गुजरात में हुए भयावह घटनाक्रम से यह साफ है कि देश में दलित-विरोधी मानसिकता अब भी जीवित है। इस तरह की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, यद्यपि पिछले दो वर्षों में इनमें तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है। हमें यह समझना होगा कि इस मानसिकता के पीछे वह राजनीतिक विचारधारा है, जो जातिप्रथा को औचित्यपूर्ण बताती है। हमें यह याद रखना होगा कि सन 2002 में गाय की खाल उतारने को लेकर झज्जर, हरियाणा में हुई हिंसा को विहिप के आचार्य गिरीराज किशोर ने उचित ठहराया था।
यूरोप के कई देशों में भी जन्म-आधारित वर्गीय और लैंगिक पदक्रम थे, जिन्हें औद्योगिक क्रांति ने समाप्त कर दिया और वहां सच्चे प्रजातंत्र का आगाज़ किया। भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्योंकि हमारे देश के औपनिवेशिक शासकों ने ऐसा नहीं होने दिया। पष्चिम में र्हुइं औद्योगिक क्रांतियों ने वहां के सामंती वर्ग का खात्मा कर दिया। यह सामंती वर्ग ही जन्म-आधारित पदक्रम का संरक्षक और पैरोकार था। भारत में औपनिवेशिक शासन ने देश के औद्योगिकरण की शुरूआत की और आधुनिक शिक्षा की भी, परंतु इनसे जन्मे आधुनिक समाज में भी जातिगत पदक्रम बना रहा। इसी आधुनिक समाज से भारतीय राष्ट्रवाद उपजा, जो जाति, धर्म और लिंग से परे सभी नागरिकों की समानता का हामी था।
औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ जहां देश  का औद्योगिकरण करना चाहते थे, वहीं वे सामंती ताकतों को भी जीवित रखना चाहते थे। सामंती ताकतों और पुरोहित वर्ग के गठजोड़ ने धार्मिक राष्ट्रवादों - मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद - को जन्म दिया। यूरोपीय देशों के उपनिवेशों में औद्योगिकरण से आए परिवर्तनों की गति उतनी तेज़ नहीं थी जितनी कि यूरोपीय देशों में थी, जहां श्रमिकों और महिलाओं ने मिलकर सामंती और पुरोहित वर्ग के गठबंधन को समूल उखाड़ फेंका। उपनिवेशों  में समाज के धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया धीमी बनी रही और उनके स्वतंत्र हो जाने के बाद भी, इन देशों में समाज के कुछ वर्गों के संरक्षण में सामंती मानसिकता बनी रही। औद्योगिक क्रांति ने उपनिवेशों  में सामाजिक बदलाव नहीं लाया। जहां तक भारत का प्रष्न है, यहां जोतिराव फुले के नेतृत्व में दलितों की समानता हासिल करने की धीमी और लंबी यात्रा शुरू हुई। सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं की समानता की लड़ाई शुरू की। इन धाराओं का दकियानूसी धार्मिक तत्वों ने कड़ा विरोध किया। इन्हीं तत्वों ने आगे चलकर हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसी संस्थाओं का रूप ले लिया।
भारतीय राष्ट्रवाद की यात्रा में अंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने कालाराम मंदिर और चावदार तालाब जैसे आंदोलन चलाकर सामाजिक प्रजातंत्र लाने की कोशिश की। उन्होंने मनुस्मृति के दहन को अपना समर्थन देकर सामाजिक समानता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई। क्रांति हमेशा एक दिन या कुछ महिनों में नहीं होती। कभी-कभी वह कई चरणों में होती है और दशकों तक जारी रहती है। इस अर्थ में जोतिराव, सावित्रीबाई, अंबेडकर और पेरियार क्रांतिकारी थे। इनका भारतीय राष्ट्रवाद ने अनमने ढंग से समर्थन किया और हिन्दू राष्ट्रवाद ने खुलकर विरोध। गांधी, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक थे, ने अछूत प्रथा का भरसक विरोध किया, यद्यपि विधानमंडलों के चुनाव में आरक्षण के मुद्दे पर उनकी सोच पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है। आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू ने अंबेडकर के नेतृत्व में एक ऐसे संविधान का निर्माण करवाया जो न केवल सभी को औपचारिक समानता देता है बल्कि दलितों की बेहतरी के लिए आरक्षण जैसे सकारात्मक कदमों का प्रावधान भी करता है। हिन्दू कोड बिल व अन्य तरीकों से भारतीय समाज में सुधार लाने के नेहरू के प्रयासों को उनकी पार्टी के भीतर के दकियानूसी तत्वों और बाहर के हिन्दू राष्ट्रवादियों ने विफल कर दिया।
दलित यदि आज भी पराधीन बने हुए हैं तो उसका मुख्य कारण हिन्दू राष्ट्रवाद है, जिसने भारतीय संविधान का भी विरोध किया था। हिन्दू राष्ट्रवादी हमेशा से आरक्षण का विरोध करते आए हैं। उनके विरोध के चलते ही अहमदाबाद में सन 1981 में दलित-विरोधी दंगे हुए थे और फिर 1986 में अन्य पिछड़ा वर्गों के खिलाफ हिंसा हुई थी। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद, हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा ने राममंदिर मुद्दे पर देशभर में जुनून खड़ा कर दिया। यह सही है कि जो लोग दलितों के खिलाफ हिंसा करते आए हैं, उन्हें शायद ही कभी उनके कृत्यों की सज़ा मिली हो। इसका कारण भी वह मानसिकता है, जिसकी जड़ें हिन्दुत्व की विचारधारा में हैं। यह विचारधारा केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जो हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए सीधे काम कर रहे हैं। इनके अतिरिक्त भी बड़ी संख्या में ऐसे तत्व, संगठन और दल हैं, जिनकी यही मानसिकता है।
इन हालातों को बदलने के लिए एक क्रांति की आवश्यकता है। परंतु यह क्रांति खूनी क्रांति नहीं होगी और ना ही यह रातों-रात होगी। यह क्रांति हमारी रोज़ाना की जिन्दगी में होगी। हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा की गोद में जा बैठे उदित राज, रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे लोग इस क्रांति की राह में एक बड़ी बाधा हैं। जहां तक सामाजिक परिवर्तन का सवाल है, हिन्दू राष्ट्रवादी, प्रतिक्रांतिकारी ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा, आरएसएस की राजनैतिक शाखा है और आरएसएस, हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है। वे तथाकथित दलित नेता, जो भाजपा के साथ हो लिए हैं, भी जातिगत समानता की राह में रोड़ा हैं। इन कथित दलित नेताओं को यह समझना चाहिए कि भाजपा, राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण संस्थानों में ऐसे मूल्यों के बीज बो रही है जो दलित-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देंगे। उदाहरणार्थ, भाजपा ने सुदर्शनराव नामक एक सज्जन को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का मुखिया नियुक्त किया है। राव का कहना है कि जाति व्यवस्था से किसी को कभी कोई समस्या नहीं रही है और किसी ने कभी इस व्यवस्था के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की। भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस का कहना है कि भारत में सभी जातियां समान थीं और समस्या मुसलमानों के हमले से शुरू हुई।
ये सारी झूठी बातें और बेबुनियाद तर्क, समाज की आंखों में धूल झोकने के प्रयास हैं ताकि जातिप्रथा बनी रहे और दलितों को नीची निगाहों से देखा जाता रहे। यही कारण है कि रोहित वेम्युला को आत्महत्या करनी पड़ती है और उना जैसी दिल को दहला देने वाली घटनाएं होती हैं। अगर भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन एक क्रांति था, तो हिन्दू राष्ट्रवाद की आज की राजनीति एक प्रतिक्रांति है जिसे अवसरवादी दलित नेताओं का पूरा समर्थन प्राप्त है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि रोहित वेम्युला व उना जैसी घटनाओं के खिलाफ दलित और गैर-दलित युवा उठ खड़े होंगे और अवसरवादी तत्वों को दरकिनार करते हुए जाति के उन्मूलन की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाएंगे।

-राम पुनियानी
         
 
Posted: 05 Sep 2016 07:47 PM PDT

जिस तरह से कश्मीर में छर्रे के बौछार वाली बंदूकों का इस्तेमाल डेढ़ महीने से ऊपर किया जाता रहा यह सोचने वाला विषय है कि क्या भारत के किसी और हिस्से में सरकार एक दिन भी इस तरह का हथियार लोगों के खिलाफइस्तेमाल कर पातीलोग शायद बगावत पर उतर आते और सरकार ही  चलने देते। सरकार के मंत्री कश्मीर की जनता को हिंसा छोड़ने की नसीहत दे रहे हैं। किंतु बुरहान वानी की मृत्यु के बाद से अब तक के कश्मीर में चले सबसेलम्बे कर्फ्यू में आम जनता से लोगों के मरने के आंकड़े रोज बढ़ रहे थे  कि सुरक्षा बलों के लोगों के। सवाल यह है कि किसकी हिंसा ज्यादा जानलेवा या घातक थीयदि लोगों से हिंसा छोड़ समाधान की दिशा में सहयोग की अपील कीजाती है तो सरकार भी सुरक्षा बलों की हिंसा को रोक माहौल को सामान्य बनाने में अपनी भूमिका अदा करनी होगी। 52 दिनों के बाद कर्फ्यू उठाया गया है।

       अरुण जेतली ने साम्बा में अपने भाषण में कहा कि चाहे हथियार का इस्तेमाल करने वाले हों अथवा पत्थर फेंकने वाले दोनों से सख्ती से निपटा जाएगा। राजनाथ सिंह ने कहा कि वे कश्मीरी युवा के हाथ में पत्थर  बंदूक के बजाएपेनकम्प्यूटर या रोजगार देखना चाहेंगे। रक्षा मंत्री मनोहर परिक्कर ने पाकिस्तान को नर्क कहा है। प्रधान मंत्री कहते हैं हिंसा के लिए उकसाने वाले बच नहीं सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जान चाहे किसी की जाएयुवा हो यासुरक्षाकर्मीतो यह देश का ही नुकसान है। नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आने वाले शरणार्थियों के लिए रु. 2000 करोड़ की राशि आवंटित करने की घोषणा की है। भाजपा के सभी नेता मानते हैं और अब महबूबामु्फ्ती से भी कहलवाया जा रहा है कि कश्मीर में जो भी असंतोष है उसके लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है।
       
भाजपा नेताओं की सरलीकृत सोच कश्मीर समस्या को समाधान की दिशा में  ले जाकर और पेचीदा बनाएगी।
       
नेताओ ंके बयान से ऐसा लगता है कि विकास से लोगों के असंतोष का दूर किया जा सकता है। किंतु यदि भौतिक विकास से ही लोग संतुष्ट हो जाते तो पड़ोसी सम्पन्न पंजाब का युवा इतने बड़े पैमाने पर नशे का शिकार नहींहोता। क्या सरकार सोचती है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आने वालों को धन देकर उनकी वफादारी खरीदी जा सकती हैयदि ऐसा होता तो कश्मीर में अन्य राज्यों की अपेक्षा विकास पर ज्यादा धन खर्च करने के बाद आज यहस्थिति  होती। कश्मीर के लोग भारत से खुश नहीं हैं। वे तब तक खुश नहीं हो सकते जब तक कश्मीर समस्या का समाधान उनके मन मुताबिक नहीं निकाला जाता। ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि यह हल किसी किस्म कीस्वायत्ता होगी जो कश्मीरियों को मंजूर हो। कम से कम भारत द्वारा थोपा कोई हल शायद यहां के लोगों को स्वीकार  हो। भाजपा नेता जितनी जल्दी यह बात समझ जाएंगे उतनी ही उनकी और कश्मीरियों की तकलीफ कम होगी।
       
कश्मीर में लोगों को भरोसा दिलाने के लिए कि सरकार समाधान के लिए गम्भीर है सुरक्षा बलों को धीरे धीरे हटाना चाहिए। 13 वर्षों में पहली बार सीमा सुरक्षा बल को भी बुलाया गया। सुरक्षा बलों की भूमिका सीमा पर हैउन्हें वहांतैनात रहना चाहिए। अंदरूनी कानून और व्यवस्था जम्मू  कश्मीर की सरकार और पुलिए पर छोड़नी चाहिए। आखिर देश में अन्य जगहों पर भी आतंकवादी हमले होते हैं। क्या हर जगह सुरक्षा बलों को न्योता दिया जाता हैऔरइतने लम्बे समय तक कहीं सुरक्षा बलों को रखा जाता है?
       
अरुण जेतली को सोचना चाहिए कि आम कश्मीरी महिला और बच्चा भी क्यों पत्थर उठा रहा हैपत्थर तो लोग सुरक्षा बलों की हिंसा की प्रतिक्रिया में उठा रहे हैं। बल्कि जेतली को तो कश्मीरियों का धन्यवाद देना चाहिए कि लोगसिर्फ पत्थर ही उठा रहे हैं और बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं कर रहे। ऐसे कश्मीरी जो सुरक्षा बलों पर घातक हमले कर सकें उनकी संख्या तो बहुत कम है। सुरक्षा बल तो पत्थरों से अपनी सुरक्षा कर ही सकती हैं। किंतु लोगजिनमेंबच्चे और महिलाएं भी शामिल हैंअपने को छर्रे के बौछार वाली बंदूकों से कैसे बचाएंगेइस हथियार से 8 वर्षीय जुनैद का फेफड़ा फटने से या 16 वर्षीय इंशा की आंख जाने से लोगों के पास क्या सुरक्षा हैजितने लम्बे समय सेकश्मीरी इन घातक हथियारों को झेल रहे हैं हमें कहना होगा कि कश्मीरी हिसंक नहीं बल्कि बहुत सहनशील हैं। मुख्य मंत्री को शर्म भी नहीं आती कि वे इंशा से अस्पताल में पूछती हैं कि क्या वह उनसे नाराज हैइतना अपमान कहांकी जनता झेलेगीभारत के मुख्य भू-भाग में इस किस्म की हिंसाशायद आदिवासी इलाके को छोड़कहीं भी बरदाश्त नहीं की जाती। कश्मीरियों का यह सवाल जायज है कि भारत में छर्रे के बौछार वाली बंदूकों का इस्तेमाल अब तकऔर कहीं क्यों नहीं किया गयाक्या हम कश्मीरी को अपना उतना नागरिक नहीं मानते जितना अन्य किसी राज्य के नागरिक कोकोई भी संवेदनशील लोकतांत्रिक सरकार इस किस्म के हथियार का इस्तेमाल अपने नागरिकों परनहीं करेगी। इसे इजराइल फिलीस्तीनी लोगों पर इस्तेमाल करता है परन्तु इजराइल का फिलीस्तीनियों से वैसा रिश्ता नहीं है जैसा कि भारत कश्मीर के साथ होने का दावा करता है।
       
पाकिस्तान को कश्मीर में होने वाली सभी प्रकार की हिंसा के लिए दोषी मान लेना सरकार की ही किरकिरी है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान का कहीं  कहीं लोगों पर प्रभाव है और भारत उसके सामने लाचार है। जिसतरह आज भारत बलूचिस्तानगिलगितबल्तिस्तान या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में लोगों के असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है वही काम पाकिस्तान ने इतने सालों से कश्मीर में किया है।
       
प्रधान मंत्री कह रहे हैं कि हिंसा के लिए उकसाने वाले बचेंगे नहीं। इस कथन में यह अहंकार झलकता है कि सरकार ही सही है और जनता गलत। क्या नरेन्द्र मोदी अपने कथन को देश के अंदर उनके हिन्दुत्ववादी साथियों द्वाराकी गई हिंसा के संदर्भ में भी लागू करेंगे?
       
भाजपा के नेताओं को सभी तरह की परिस्थितियों से निपटने का एक ही तरीका आता है - सख्ती। कश्मीर का मामला बहुत पेचीदा हो चुका है। भाजपा नेता इतना ही कर सकते हैं कि उसे और पेचीदा  बनाएं।
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 संदीप पाण्डेय