शनिवार, 18 अप्रैल 2015

राजनैतिक विचारधारा और इतिहास की व्याख्या

लोकसंघर्ष !


Posted: 17 Apr 2015 09:46 AM PDT
यद्यपि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी निवासियों का सांझा इतिहास है तथापि विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं में यकीन करने वाले अलग.अलग समूह, इस इतिहास को अलग.अलग दृष्टि से देखते हैं। दिल्ली में सरकार बदलने के बाद से, कई महत्वपूर्ण संस्थानों की नीतियों में रातों.रात बदलाव आ गया है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर व राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद ;एनसीईआरटी, उन अनेक संस्थाओं में शामिल हैं, जिनके मुखिया बदल दिये गये हैं और नए मुखिया, संबंधित विषय में अपने ज्ञान से ज्यादा, शासक दल की विचारधारा के प्रति अपनी वफादारी के लिए जाने जाते हैं। ये वे संस्थान हैं जो इतिहास व शिक्षा सहित समाजविज्ञान के विभिन्न विषयों से संबंधित हैं। इन संस्थानों की नीतियों व नेतृत्व में परिवर्तन,भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस के इशारे पर किया गया प्रतीत होता है। आरएसएस की राजनैतिक विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद है, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। आरएसएस के सरसंघचालक ने हाल ;3 मार्च 2015 में कहा था कि भारतीय इतिहास का'भगवाकरण' होना चाहिए। उनका समर्थन करते हुए भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारतीय इतिहास का भगवाकरण समय की आवश्यकता है और संबंधित मंत्री को इतिहास की पुस्तकों पर भगवा रंग चढाने में गर्व महसूस करना चाहिए।
इतिहास की किताबों के भगवाकरण से क्या आशय है ? भगवाकरण शब्द को प्रगतिशील व तर्कवादी इतिहासविदों और बुद्धिजीवियों ने तब गढ़ा था, जब वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ;1998 में मानव संसाधान विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा, इतिहास व अन्य समाजविज्ञानों के पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों में व्यापक परिवर्तन करने शुरू किए। जो किताबें मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में लागू की गईं थीं उनमें कई तरह की आधारहीन बातें कही गईं थीं जैसे, चूंकि हम मनु के पुत्र हैं इसलिए हम मनुष्य या मानव कहलाते हैं,वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पेड़.पौधे अजीवित होते हैं परंतु हिंदू, पेड़.पौधों को जीवित मानते हैं और जब बंदा बैरागी ने इस्लाम कुबूल करने से इंकार कर दिया तो उसके लड़के की हत्या कर उसका कलेजा निकालकर, बंदा बैरागी के मुंह में ठूंसा गया। इन पुस्तकों में सती प्रथा को राजपूतों की एक ऐसी परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया थाए जिस पर हम सब को गर्व होना चाहिए। मध्यकाल के इतिहास को भी जमकर तोड़ामरोड़ा गया। जैसे,यह कहा गया कि कुतुबमीनार का निर्माण सम्राट समुद्रगुप्त ने किया था और उसका मूल नाम विष्णुस्तंभ था। इन पुस्तकों में शिवाजी और अफजल खान, अकबर और महाराणा प्रताप, गुरू गोविंद सिंह और औरंगजैब़ के बीच हुए युद्धों.जो केवल और केवल सत्ता हासिल करने के लिए लड़े गये थे.को सांप्रदायिक रंग देते हुए उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इन परिवर्तनों की पेशेवर, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष इतिहासविदों ने तार्किक आधार पर आलोचना की। उन्होंने इतिहास के इस रूप में प्रस्तुतिकरण के लिए 'शिक्षा का भगवाकरण' शब्द इस्तेमाल करना शुरू किया। परिवर्तनों की आलोचना का जवाब देते हुए मुरली मनोहर जोशी ने कहा ;अप्रैल 2003 कि यह भगवाकरण नहीं बल्कि इतिहास की विकृतियों को ठीक करने का प्रयास है। लेकिन अब, बदली हुई परिस्थितियों और परिवर्तित राजनैतिक समीकरणों के चलते, वे उसी शब्द.भगवाकरण.को न सिर्फ स्वीकार कर रहे हैं वरन् उस पर गर्व भी महसूस कर रहे हैं।
भारत में इतिहास का सांप्रदायिकीकरण,अंग्रेजों ने शुरू किया। उन्होंने हर ऐतिहासिक घटना को धर्म के चश्मे से देखना और प्रस्तुत करना प्रारंभ किया। अंग्रेजों के रचे इसी इतिहास को कुछ छोटे.मोटे परिवर्तनों के साथ, हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने अपना लिया। हिंदू सांप्रादयिक व राष्ट्रवादी तत्व कहते थे कि भारत हमेशा से एक हिंदू राष्ट्र है और मुसलमान व ईसाई, भारत में विदेशी हैं। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के लिए इतिहासए आठवीं सदी में मोहम्मद.बिन.कासिम के सिंध पर हमले से शुरू होता था। उनका दावा था कि चूंकि मुसलमान भारत के शासक थे इसलिए अंग्रेजों को इस देश का शासन मुसलमानों को सौंपकर यहां से जाना था। इतिहास के इसी संस्करण का किंचित परिवर्तित रूप पाकिस्तान में स्कूलों और कालेजों में पढ़ाया जाता है।
इसके विपरीत,जो लोग धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति प्रतिबद्ध थे उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी राजा का धर्म, उसकी नीतियों का निर्धारक नहीं हुआ करता था। यही बात स्वाधीनता आंदोलन के सर्वोच्च नेता महात्मा गांधी ने भी कही। अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में वे लिखते हैंए 'मुस्लिम राजाओं के शासन में हिंदू फलेफूले और हिंदू राजाओं के शासन में मुसलमान। दोनों पक्षों को यह एहसास था कि आपस में युद्ध करना आत्मघाती होगा और यह भी कि दोनों में से किसी को भी तलवार की नोंक पर अपना धर्म त्यागने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। इसलिए दोनों पक्षों ने शांतिपूर्वक, मिलजुलकर रहने का निर्णय किया। अंग्रेजों के आने के बाद दोनों पक्षों में विवाद और हिंसा शुरू हो गई.क्या हमें यह याद नहीं रखना चाहिए कि कई हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे और उनकी नसों में एक ही खून बह रहा है? क्या कोई व्यक्ति मात्र इसलिए हमारा दुश्मन बन सकता है क्योंकि उसने अपना धर्म बदल लिया हैक्या मुसलमानों का ईश्वर, हिंदुओं के ईश्वर से अलग है? धर्म, दरअसल,एक ही स्थान पर पहुंचने के अलग.अलग रास्ते हैं। अगर हमारा लक्ष्य एक ही है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि हम अलग.अलग रास्तों से वहां पहुंच रहे हैं? इसमें विवाद या संघर्ष की क्या गुंजाईश है'
स्वाधीनता के बाद अंग्रेजों द्वारा रचे इतिहास को कुछ समय तक पढ़ाया जाता रहा। शनैः शनैः, इतिहास की पुस्तकों को तार्किक आधार देते हुए उनमें इतिहास पर हुये गंभीर शोध के नतीजों का समावेश किया जाने लगा। एनसीईआरटी के गठन के बाद,उन स्कूलों में, जिनमें एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू था, इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या वाली पुस्तकों के स्थान पर एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं। फिर, सन् 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के सत्ता में आने के बादए डॉ.जोशी ने पाठ्यक्रम के सांप्रदायिकीकरण और शिक्षा के भगवाकरण का सघन अभियान चलाया। सन् 2004 में एनडीए सत्ता से बाहर हो गई और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने केंद्र में सत्ता संभाली। इसके बाद, कुछ हद तक, स्कूली पाठ्यपुस्तकों में वैज्ञानिक सोच और तार्किक विचारों की वापसी हुई और पुस्तकों को सांप्रदायिकता के जहर से मुक्त करने के प्रयास भी हुए। चाहे वह पाकिस्तान हो या भारत,इतिहास के सांप्रदायिक संस्करण का इस्तेमाल,धार्मिक राष्ट्रवाद को मजबूती देने के लिए किया जाता है। इसलिए भारत में ताजमहल को तेजो महालय नामक शिव मंदिर बताया जाता है और स्वाधीनता संग्राम को मुसलमानों के खिलाफ लड़ा गया धार्मिक युद्ध। मुस्लिम राजाओं को मंदिरों का ध्वंस करने व हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का दोषी बताया जाता है। इस विभाजनकारी पाठ्यक्रम का इस्तेमाल राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए होता है। पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में मुस्लिम राजाओं का महिमामंडन किया जाता है और हिंदू राजाओं की चर्चा तक नहीं होती।
आरएसएस स्कूलों की एक विस्तृत श्रृंखला का संचालन करता है जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय और विद्या भारती शामिल हैं। इन स्कूलों में इतिहास का सांप्रदायिक संस्करण पढ़ाया जाता है। वर्तमान सरकार की यही कोशिश है कि आरएसएस के स्कूलों का पाठ्यक्रम ही सरकारी शिक्षण संस्थाओं में लागू कर दिया जाए। जाहिर है कि यह खतरनाक कदम होगा। इससे विविधताओं से भरे हमारे बहुवादी देश में विघटनकारी ताकतें मजबूत होंगी।
-राम पुनियानी
 
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

धर्म के नाम पर अधर्म का उन्माद

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

धर्म के नाम पर अधर्म का उन्माद

 अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में गत् 19 मार्च को फरख़ंदा नामक· एक 27 वर्षीय मुस्लिम लड़की को  स्वयं को धर्म के ठेकेदार बताने वाले मुस्लिम उन्मादियों की  हज़ारों की  भीड़ द्वारा जि़ंदा जला कर मार डाला गया तथा उसकी जली हुई क्षत-विक्षत लाश को काबुल नदी में इन्हीं उन्मादी आसामाजिक तत्वों द्वारा फेंक दिया गया। उन्मादियों का आरोप है कि इस युवती ने कुरान शरीफ को जलाकर इस धार्मिक किताब के साथ बेअदबी की थी। जबकि दूसरी ओर लड़की के भाई नजीबुल्ला मलिकज़ादा तथा फरख़ंदा के पिता ने ऐसे सभी आरोपों को  झूठा करार दिया है। फरख़ंदा के परिजनों  का कहना है कि वह पांचों वक्त की नमाज़ नियमित रूप से अदाक रती थी। उसने इस्लामिक स्टडीज़ में डिप्लोमा भीकर रखा था। इतना ही नहीं बल्कि वह नियमित रूप से कुरान शरीफ की तिलावत भी किया करती थी तथा अपने धर्म व धार्मि· पुस्तकों का दिल से सम्मान करती थी। लिहाज़ा उसपर लगाए जाने वाले सभी आरोप झूठे व निराधार हैं। कुरान शरीफ जलाए जाने की घटना से फरख़ंदा का कोई लेना-देना नहीं है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने इस घटना के संबंध में अपनी जांच के बाद यह पाया है कि फरखंदा मानसिक रोगी थी। इस युवती को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने व उसके बाद उसे जलाए जाने व उसके शव को नदी में फेंके जाने जैसी अमानवीय घटना ने अफगानिस्तान सहित पूरे विश्व के मानवता प्रेमियों को विचलितकर दिया है। इस घटना के विरोध में अफगानिस्तान में उदारवादी वर्ग के लोग खासतौर पर महिलाओं द्वारा ज़बरदस्त रोष व्यक्त किया जा रहा है।

                इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का एक दु:खद पहलू यह भी था कि जिस समय धर्मांध लोगों कीउग्र भीड़ द्वारा फरखंदा को पीटा व जलाया जा रहा था उस समय अफगानिस्तान पुलिस के कर्मचारी तमाशाई बने इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गऩी ने भी इस घटना को एक जघन्य अपराध बताया है। तथा पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए आयोग गठित करने का आदेश दिया है। राष्ट्रपति गऩी ने यह भी स्वीकार किया कि जिस पुलिस ने तालिबानों के विरुद्ध संघर्ष करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  है वही अफगान पुलिस ऐसी घटनाओं से निपटने हेतु पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अफगान पुलिस का 90 प्रतिशत ध्यान तालिबान विरोधी लड़ाई की ओर रहता है जबकि यह उनकी संवैधानिक भूमिका  नहीं है। बहरहाल सूत्रों के  मुताबिक· फरखंदा की इस बेरहम हत्या के आरोप में 21 लोगों को गिरफ्तार  किया गया है जिनमें 8 तमाशबीन पुलिस·र्मी भी शामिल हैं। इस घटना के विरुद्ध अफगानिस्तान की महिलाओं के  गुस्से का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि  जो मुस्लिम महिलाएं आमतौर पर शव यात्रा में शामिल नहीं होतीं तथा किसी शव यात्रा में उन्हें मर्दों के साथ कब्रिस्तान में जाने की  इजाज़त नहीं होती उन्हीं महिलाओं ने बड़ी संख्या  में फरखंदा की शव यात्रा में न केवल शिरकत कीबल्कि उसके  शव को नहलाने-धुलाने से लेकर उसके ताबूत को कंधा देने व उसके अंतिम संस्कार यानी  कब्र में उतारने तक में आक्रोशित मुस्लिम महिलाएं नकाब पहने हुए अग्रणी भूमिका में रहीं। शव यात्रा के  पूरे मार्ग में महिलाओं द्वारा अल्लाह ओ अकबर की सदाएं बुलंद की गईं तथा प्रदर्शन रूपी इस शव यात्रा में सरकार से यह मांग की गई की महिलाओं तथा मानवता के विरुद्ध इस प्रकार का जघन्य अपराध अंजाम देने वाले समस्त अपराधियों व उनके समर्थको को ·ड़ी सज़ा दी जाए। इस घटना से एक बात और साबित हो रही है कि अफगानिस्तान की जो पुलिस उन्मादी भीड़ के हाथों से एक लड़कीको जि़ंदा नहीं बचा सकी वह पुलिस तालिबानों अथवा अन्य समाज विरोधी दुश्मनों से अफगानिस्तान की जनता को आखिरकैसे बचा सकती है? इस घटनाका सीधा सा अर्थ यही निकलता है कि पुलिस ऐसे हालात से निपटनेके लिए कतई सक्षम नहीं है।

                कुरान शरीफ को  जलाने अथवा इसके साथ बेअदबी करने के  हादसे तथा ऐसी घटनओं के विरुद्ध जनता का उन्माद पहले भीकई बार दुनिया के कई देशों में भड़कते हुए देखा जा चुका है। अफगानिस्तान में ही अमेरिका द्वारा संचालित बगराम जेल में 2012 में कुरान शरीफ के जलाए जाने की घटना ने अमेरिकी सेना के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी हिंसा का रूप धारण कर लिया था। पांच दिनों तक यह हिंसा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में फैली हुई थी। इस हिंसा में 30 लोग मारे गए थे। इसी प्रकार नवंबर 2014में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में लाहौर से 60 किलोमीटर की  दूरी परकोट राधा किशन नामक स्थान पर एक ईसाई दंपत्ति को मुसलमानों की उन्मादी भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डाला गया तथा बाद में उनकी लाशों को ईंट के  भट्टे में झोंककर जला दिया गया था। इस दंपत्ति पर भी यह आरोप था कि इसने कुरान शरीफ को जलाया तथा बाद में जले हुए कुरान के पन्नों को कूड़ेदान में फेंक दिया । हालांकि  इस मामले ने भी बाद में एक विवाद का रूप ले लिया था। ऐसी खबरें आईं थीं कि ईसाई दंपति पर कुरान शरीफ के अपमान का आरोप लगाने वाले एक मौलवी ने जानबूझ कर रंजिश के तहत ईसाई दंपत्ति पर ऐसा इल्ज़ाम लगाया था। यह घटनाएं ये सोचनेके लिए मजबूर करती हैं कि क्या धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने वाली उग्र भीड़ को यह अधिकार हासिल है कि वह जब चाहे किसी के भी विरुद्ध ऐसे गंभीर व संवेदनशील आरोप मढ़कर उसे सामूहिक हिंसा का निशाना बनाए? उसे पीट-पीट कर मार डाले और उसकी लाश को स्वयं आग के हवाले कर दे? यदि यह मान भी लिया जाए कि कुरान शरीफ का अपमान अथवा बेहुरमती करने वाले ऐसे अपराध करते भी रहे हैं तो भी क्या इस्लाम धर्म या इसकी शिक्षाएं इस बात की इजाज़त देती हैं कि कुरान शरीफ के साथ बदसलूकी करने वालों को किसी उग्र भीड़ द्वारा इसी प्रकार की कुर्र्ता पूर्ण  सज़ाएं दी जाएं?

                कभी ऐसी घटनाओं को लेकर तो कभी हज़रत मोहम्मद अथवा इस्लाम विरोधी कार्टूनों के प्रकाशन को लेकर मुसलमानों की इस प्रकार की  उग्र व उन्मादी भीड़ के सड़को पर उतरने व हिंसा पर उतारू होने ·ीअने· घटनाएं विश्व ·े विभिन्न देशों में होती रही हैं। ज़ाहिर है ऐसी सभी घटनाओं के पीछे मुसलमानों की कटरपंथी व रूढ़ीवादी सोच तथा ऐसी सोच का पोषण करने वाले धर्मगुरु शामिल रहते हैं। यही लोग अपनी तकऱीरों के द्वारा अपने वर्ग के  अनुयाईयों मेंआकरोष  भड़काते हैं। भले ही एसे धर्मगुरु यह क्यों न समझते हों कि वे इस प्रकार का उन्माद व उत्तेजना फैला·र तथा किन्हीं एक-दो व्यक्तियों पर ऐसे दोष मढ़कर उनके विरुद्ध भीड़ को हिंसा पर उतारू होने हेतु वरगलाकर अपने धर्म की सेवा कर रहे हों अथवा पुण्य लूट रहे हों या अपने लिए जन्नत जाने का मार्ग प्रशस्तकर रहे हों। परंतु वास्तव में इस प्रकार की हिंसक प्रतिक्रियाएं न केवल धर्म व इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध हैं बल्कि  इस प्रकार की हिंसक घटनाओं से इस्लाम धर्म कलंककित होता है। ऐसी ही  ज़हरीली सोच ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक द्वारा सिर्फ इस लिएकरा दी थी क्योंकि सलमान तासीर पाकिस्तान में लागू ईश निंदा कानून पर पुनर्विचार किए जाने के पक्षधर थे। इस घटना के बाद भी एक सवाल यह पैदा हुआ था कि मलिक  मुमताज़ हुसैन कादरी द्वारा सलमान तासीर का  अंगरक्षक होने के बावजूद उनकी हत्याकर देना कहां का धर्म है? क्या इस्लाम धर्म इस बात की इजाज़त देता है कि किसी के अंगरक्षक के रूप में उसकी सुरक्षा कादायित्व संभाल रहे व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने ही स्वामी की हत्या किए जाने जैसा घृणित अपराध किया जाए? और इससे अधिक अफसोसनाक यह कि कादरी द्वारा इस घिनौने अपराध को अंजाम देने के बाद पाकिस्तान की अदालत में पेशीके समय उसी हत्यारे पर फूल बरसाए गए तथा उसका कट्टरवादी मुस्लिम समाज द्वारा जिनमें तमाम वकील भी शामिल थे, ज़ोरदार स्वागत किया
ऐसी घटनओं को रोकने के लिए विश्वस्तर पर मुस्लिम धर्मगुरुओं के संगठित होने तथा ऐसे उन्मादको रोकने हेतु अपने-अपने अनुयाईयों को  नियंत्रित करने व उन्हें सहनशीलता का  पाठ पढ़ाए जाने की बहुत सख्त ज़रूरत है। यदि कहीं इस प्रका र का  ईश निंदा संबंधी अपराध होता भी है तो स्थानीय न्याय व्यवस्था तथा स्थानीय शासन व प्रशासन पर भरोसा करते हुए संबंधित घटना से कानूनी तौर पर निपटने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से कुरान शरीफ इस्लाम  का सबसे पवित्र व सम्मानित धर्म ग्रंथ है। इसका अपमान मुसलमानों में स्वभाविक रूप से ग़ुस्सा पैदा कर सकता है। परंतु यही इस्लाम धर्म और यहीकुरान शरीफ मानवता का पाठ भी पढ़ाता है। निहत्थे पर ज़ुल्म  करने से भी रोकता है। महिलाओं पर अत्याचार करना या किसी के शव को जलाया जाना या उसे जि़ंदा जला दिया जाना इस्लामी शिक्षा  का हिस्सा कतई नहीं है। न ही ऐसे घृणित अपराध अंजाम देकर दुनिया  का कोई भी धर्मगुरु या कोई मुसलमान जन्नत में जाने या पुण्य ·मानने का दावा कर सकता है। ऐसे कृत्य पूरी तरह से इस्लाम विरोधी व मानवता विरोधी हैं।
  -तनवीर जाफरी

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

फर्जी डिग्री : डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय .

मंगलवार, 31 मार्च 2015



किसी राष्ट्र के बौद्धिक स्तर का आकलन वहां की शिक्षा व्यवस्था के स्तर पर निर्भर करती हैं। शिक्षा का पतन किसी भी राष्ट्र के पतन का द्योतक होता है और जब शिक्षा के कर्णधार ही क्षुद्र स्वार्थवश शिक्षा की नैया डुबोने लग जायें तो शिक्षा और राष्ट्र को पूरी तरह से रामभरोसे ही समझना चाहिए। व्यावसायिकता की मानसिकता का यह चरम बिन्दु है जब व्यक्ति ने सब कुछ व्यावसायिक ही समझ लिया है। वर्तमान समय में शिक्षा की व्यवसायिकता को देखते हुए यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि विद्या मन्दिर धन उगाही और शोषण के अड्डे बन गए हैं। जहां अयोग्य शिक्षितों की फौज तैयार की जा रही है। इन विद्या मन्दिरों द्वारा भारत के जिस युवा भविष्य का निर्माण किया जा रहा है वह भार साबित होगा और आज की थकी मांदी कानून व्यवस्था, खूंखार राजनीतिक व्यवस्था, नपुंसक नौकरशाही और शिक्षा के सामन्ती जिम्मेदारान; इन चारों की चैकड़ी ने शिक्षा को ऐेसे गर्त की ओर धकेल दिया है जिसके आगे अंधकार के सिवा कुछ नहीं है। यह अभी सबकी आंखो को नहीं दिखायी देता क्योंकि उन पर स्वार्थ, अज्ञानता, कूपमण्डूकता, उदासीनता इत्यादि का पर्दा पड़ा हुआ है। हकीकत यह है कि यह शिक्षा की वह भयावह स्थिति है जो आने वाली पीढ़ी की मानसिक विकलांगता इस स्तर तक बिगाड़ देगी जिसे सुधारने में सदियां शहीद हो जाएंगी। स्थिति बन्दूक से निकली गोली की हो जाय इससे पहले देश की शिक्षा के कर्णधार शिक्षा को लेकर सचेत हो जायं और दृढ़निष्ठ कर्तव्य में लग जायं।
    बात डाॅ0 राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों की है। गत दशक में महाविद्यालय कुकुरमुत्तों के अनुपात में उगे और शिक्षा को भी कुकुरमुत्ते के स्तर तक पहुँचाने में समूचे खानदान के साथ जुट गये। मान्यताएं मिलती गयीं और महाविद्यालय बढ़ते रहे। इन्ही के साथ रोपित भ्रष्टाचार भी बढता रहा। शिक्षा के मालवीयों का असंख्य संख्या में अवतार हुआ। जिन्होने अपने अपने अनुसार शिक्षा का पिण्डदान किया। शिक्षा मन्दिर के महन्तों ने शिक्षा को मन्दिर से निकालकर बाजार में लाकर खड़ा कर दिया। यह सब किसी एक के द्वारा या अचानक नहीं हुआ। इसकी जड़ भी है और उसके नाश की दवा भी। इन महाविद्यालयों का शासनादेश से छत्तीस का सम्बन्ध होता है। स्ववित्तपोषित वित्तशोषित होते जा रहे हैं। महाविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रत्यक्ष प्रकट है। बड़ा ही दुखद आश्चर्य होता है कि यह सब साक्षात होता देखकर राजनीति और प्रशासन दोनो ही मौन है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या कहा जा सकता है।
    स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों को संचालित करने हेतु समय समय पर विभिन्न शासनादेश जारी होते रहे हैं जो निश्चित ही स्वागत योग्य हैं। छात्रों की संख्या में जिस अनुपात में वृद्धि हूई उस अनुपात में महाविद्यालय खोल पाना सरकार के वश में नही था या फिर उन्होनंे कोशिश नहीं की। फलतः स्ववित्तपोषित व्यवस्था अस्तित्व में आयी। इसके शासनादेशों में महाविद्यालय के मानकों का निर्धारण किया गया, जिसका दुरूपयोग ज्यादा हुआ सदुपयोग बहुत कम। शोषण अभिभावक, प्राध्यापक और सरकारी अनुदानो का हुआ। 
    महाविद्यालय में प्राध्यापक पद पर नियुक्ति की अपनी योग्यताएं हैं। योग्य प्राध्यापक की नियुक्ति के आधार पर विश्वविद्यालय सम्बन्धित महाविद्यालय को विषय का आवंटन, मान्यता आदि प्रदान करता है। आज यह सिस्टम आम हो गया है कि अभ्यर्थी के कागजात लेकर अनुमोदन तो करवा लिये जाते हैं लेकिन उन्हे पढ़ाने के लिए नही बुलाया जाता। वे कहीं अलग पढ़ाते है और अनुमोदन भी एकाधिक काॅलेजों से चलता रहता है। काॅलेज में अनुमोदित प्राध्यापक के स्थान पर अन्य लोग पढ़ाते है जो सामान्यतः नाॅनक्वालीफाइड होते हैं। एक अभ्यर्थी का अनुमोदन एकाधिक काॅलेज से होना अपराध है। जबकि व्यवहार में यह आम है। इसमें कभी कभी दोनो पक्ष की सहमति होती है और कभी कभी इस अपराध की जानकारी उस अभ्यर्थी को नहीं होती जिसका अनुमोदन उसकी बगैर जानकारी के हो जाता है। हद तो तब हो जाती है जब विश्वविद्यालय यह सब जानकार मौन बना रहता है और कोई कार्रवाई नही करता। इससे भ्रष्टाचार को शह मिलती है। शायद ही ऐसा कोई महाविद्यालय हो जहां पर समस्त अनुमोदित प्राध्यापक अध्यापन करते हैं।
प्राध्यापकोें के वेतन भुगतान का शासनादेश व्यावहारिक न होने से वह प्रबन्ध तंत्र का हथियार बन गया है जिसका प्रहार प्राध्यापक झेलता है। शासनादेश में पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत तक वेतन मद में खर्च करने का प्रावधान है। जिसे कोई भी समझदार या गैर समझदार उचित नही कह सकता है। शासनादेश के अनुपालन में गिने चुने नाम मात्र महाविद्यालयों में प्राध्यापकों को मानक के अनुकूल वेतन मिलता होगा। सर्वाधिक संख्या ऐसे काॅलेजों की मिलेगी जहां के प्राध्यापको को मानकानुकूल वेतन नहीं मिलता (कहीं कहीं खाते पर भी नहीं दिया जाता)।सी0पी0कटौती तो गधे के सर की सींग ही समझिये। वेतन सम्बन्धी शासनादेश की पंगुता ने प्रबन्ध को मनमाना वेतन देने के लिए निरंकुश छोड़ दिया है और इसका खामियाजा वह शिक्षक पीढ़ी भुगत रही है जो उसे लेने को अभिशप्त है।
प्राध्यापक के निष्कासन से सम्बन्धित भी शासनादेश है। इस शासनादेश में कुछ त्रुटियां भी हैं। जैसे अनुमोदित प्राध्यापक का हर तीसरे या पांचवे साल नवीनीकरण कराना। एक तरह से टीचर को ठेके पर नियुक्ति देने जैसा है। नियमतः प्राध्यापक का निष्कासन विश्वविद्यालय द्वारा होना चाहिए लेकिन देखा यही गया है कि वह महाविद्यालय में विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त समय तक के लिए नही अपितंु प्रबन्ध समिति की मर्जी तक होता है। प्राध्यापक अस्थिरता के अवसाद से ग्रसित होता रहता है। 
निरंतर और भयंकर होती जाती नकल प्रथा के विषदन्त ने शायद ही किसी स्ववित्तपोषित काॅलेज पर निशान न छोड़े हों। जिस तरह से आज शिक्षा के तथाकथित मालवीयों ने नकल को महाविद्यालयों का मानक बना लिया है। शिक्षा मन्त्री के काॅलेज से सामूहिक नकल पकड़ी जाती है। जो महाविद्यालय जितना ही अधिक नकल करा सकता है वह उतना ही अधिक छात्रों के एडवीसन पाता है। छात्र आकर एडमीशन कराता है फिर प्रवेश पत्र लेने आता है (अगर कोई परिचित काॅलेज मे हुआ तो वह भी घर ही पहुंच गया) और फिर परीक्षा देने। इसी प्रकार मात्र कुछ दिन आकर वह स्नातक और परास्नातक की डिग्री पा जाता है। ऐसे सिर्फ परीक्षा के दिनों आने वाले छात्रों की संख्या कोई कम नहीं है। जब उसी काॅलेज के बच्चे उसी काॅलेज में परीक्षा देंगे तो परीक्षा कैसे होगी ये तो सब जानते हैं।
तमाम काॅलेज ऐसे भी है जहां के पुस्तकालयों में दरिद्रता का साकार रूप दिखायी पड़ता है। एक तो छात्र की पढ़ने में रूचि की कमी है दूसरे पुस्तकालय के नाम पर खाना पूर्ती। पाठ्यक्रम की तो पुस्तकें शायद मिल जाएंगी लेकिन पत्र पत्रिकाएं पाठ्यक्रम से सम्बघित अन्य उपयोगी पुस्तको का दर्शन तो शायद ही मिले। पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति में भी प्राध्यापक नियुक्ति जैसी खामियां है जो प्रबन्ध समिति को मनमाना करने को प्रेरित करती है।
बहुत काॅलेजो में क्लर्को की संख्या बहुत कम देखी जाती है। क्लर्को का आभाव, छात्रों की अधिक संख्या के कारण प्राध्यापको उन कागजों को निपटाता है। तमाम प्रबन्ध समिति का व्यवहार प्राध्यापकों के प्रति तानाशाही जैसा होता है। वे प्राध्यापकों पर मिलिट्री जैसा अनुशासन रखना चाहते हैं और तमाम रखते भी हैं। टीचर टीचर न रहकर बाबू बन जाता है।
ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षा के इन स्ववित्तपोषित संस्थानों की यह बीमारी लाइलाज है। चूँकि बीमारी का कारण है तो इसका समाधान भी है। पहली समस्या प्राध्यापकों के एकाधिक काॅलेजो के अनुमोदन की है जिसके कारण एक टीचर का अनुमोदन अनेक काॅलेजो से चलता रहता है और विश्वविद्यालय को गलत जानकारी देकर महाविद्यालयों को संचालित किया जाता है। वेतन भुगतान आदि की प्रक्रिया भी घपले में चलती रहती है। ऐसे में विश्वविद्यालय का यह दायित्व अपरिहार्य हो जाता है कि वह प्राध्यापक के अनुमोदन सम्बन्धी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाते हुए अनुमोदित प्राध्यापकों का विवरण आॅनलाइन करे। प्रदेश स्तर पर प्राध्यापको का अनुमोदन आॅनलाइन हो जाने से एक प्राध्यापक का अनुमोदन एक ही काॅलेज से होगा जिससे योग्य प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन सम्भव हो सकेगा। आॅनलाइन हो जाने से प्राध्यापक भी उसी काॅलेज मे अध्यापन कर सकेगा जहां से उसका अनुमोदन चल रहा है। महाविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में विश्वविद्यालय को यह कदम अबिलम्ब उठाना होगा और यहीं से भ्रष्टाचार निवारण की ठोस शुरुवात करनी होगी।
प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान हेतु स्पष्ट शासनादेश है कि शुल्क के रुप में प्राप्त आय का पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत वेतन मद में खर्च किया जाएगा। अधिकांश महाविद्यालय ऐसे राजनीतिज्ञों के है जिनका सत्ता और राजनीति में काफी दखल होता है। लाखों करोड़ो रूपये खर्च करके महाविद्यालय अगर इतना रूपया वेतन मद में खर्च कर देेंगे तब तो वो फुटपाथ पर आ जाएंगे। आज शिक्षालय खोलना समाज सेवा नही है यह अर्थोपार्जन का माध्यम है। आज यह कहते आसानी से सुना जा सकता है कि आज के समय में सबसे बढि़या धन्धा स्कूल खोलना है। यह सही भी है आज पता नही कितने पूंजीपतियो ने राजनीतिज्ञों ने अपनी काली कमाई से स्कूल खोलकर अपने काले धन को गोरा बना लिया है। ऐसे में उनसे पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत  वेतन मद में खर्च करने की अपेक्षा करना हास्यास्पद है। शासन को चाहिए कि वेतन सम्बन्घी शासनादेश को व्यवहारिक रूप दे। फीस के रूप में प्राप्त आय से वेतन का निर्धारण न करके न्यूनतम वेतनमान की व्यवस्था करे। शासनादेश के अनुपालन में वेतन भुगतान खाते से देना अनिवार्य करे। चूकि भविष्य केवल सरकारी प्राध्यापकों का ही नही होता है आज की महंगायी में नाम मात्र वेतन पर गुजारा करने वाले योग्य प्राध्यापकों का भी होता है। अतः सी0पी0एफ0 कटौती को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।
प्राध्यापक के निष्कासन से सम्बन्धित शासनादेश व्यवहारिक है लेकिन  व्यवहार मे लाया नहीं जाता। वैसे तो प्राध्यापक का निष्कासन विश्वविद्यालय की संस्तुति से ही होता है लेकिन हकीकत यह है कि काॅलेज मे प्राध्यापक प्रबन्ध समिति की मर्जी तक कार्य कर सकता है। वह जब चाहे तब उसे हटा सकता है। ऐसे में प्राध्यापक अस्थिरता और पराधीनता की मानसिकता में जीता है। जब सरकारी प्राध्यापक और स्ववित्तपोषित प्राध्यापक की योग्यता समान रखी गयी है, कार्य समान रखा गया है तो अगर समान वेतन नही दे सकते तो नियुक्ति को तो स्थायी करने का पक्ष बनता ही है। प्राध्यापको का अनुमोदन स्थायी किया जाय या उन्हे अनुमोदन पत्र की जगह नियुक्ति पत्र दिया जाय। निश्चित अवधि पर नवीनीकरण करवाते रहने से पता क्या हित शासन, या विश्वविद्यालय का है यह समझ में नही आता। लगता है कि यह नियम प्राध्यापकों के मानसिक शोषण और उसकी पराधीनता को बनाये रखने के लिए बनाया गया है।
इन महाविद्यालयों में व्याप्त नकल व्यवस्था एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसका स्थायी समाधान अबिलम्ब खोजा जाना अति आवश्यक है। जब शिक्षालयों के संचालक नकल कराने को परम ध्येेय मान बैठे हों तब इसके विषय में सहज ही समझा जा सकता है। वर्तमान परीक्षा प्रणाली नकल को रोकने में सक्षम नही हो सकती। जब उसी काॅलेज के छात्र उसी काॅलेज मे परीक्षा देंगे तो नकल तो करेंगे ही। विश्वविद्यालय प्रशासन को चाहिए कि नकल रोकने के लिए ठोस कदम उठाये। इस क्रम में सबसे पहला कदम यह उठाना होगा कि परीक्षा केन्द्रो को स्थायी न किया जाय। ऐसा करके ही काफी हद तक तक परीक्षा की सुचिता और पवित्रता बनायी रखी जा सकती है। 
पुस्तकालय, पुस्तकालयाध्यक्ष आदि के सम्बन्ध को विश्वविद्यालय को चाहिए कि वह महाविद्यालयो में मानको के औचक निरीक्षण की पारदर्शिता पूर्ण व्यवस्था करें। मानक पूरे न करने की दशा में विश्वविद्यालय द्वारा तुरन्त वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए। क्लर्को की संख्या भी मानकानुकूल होना चाहिए।
विश्वास नही होता कि यह भ्रष्टाचार विश्वविद्यालय और प्रशासन की जानकारी में नही है। अगर जानकारी मे होने के बावजूद इस पर आज तक कोई ठोस कदम नही उठाया गया तो इसका क्या कारण हो सकता है यह आज के बुद्धिजीवियों के लिए चिन्तन से ज्यादाा चिंता का विषय है। और अगर इतना प्रत्यक्ष और विकराल भ्रष्टाचार उसके संज्ञान में नही है तो शिक्षा के जिम्मेदार अपनी कुर्सी पर बैठे रहने के योग्य नहीं हैं। जब ऐसे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाले ही अंधे, बहरे, गूंगे की भूमिका निभाएंगे तो अदम जी की ये पंक्तियां ही रास्ता तलाशने पर विवश होंगी-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत, ये बात कह रहा हूँ मै होशो हवाश में।
---------------डॉ.अनिल कुमार  सिंह